बेटियों की शिक्षा पर विचार - मेरी वॉल्स्टनक्राफ्ट
सारांश मैरी वोल्स्टनक्राफ्ट की पुस्तक 'बेटियों की शिक्षा पर विचार' (Thoughts on the Education of Daughters) 1787 में प्रकाशित हुई थी। यह पु...
सारांश
मैरी वोल्स्टनक्राफ्ट की पुस्तक 'बेटियों की शिक्षा पर विचार' (Thoughts on the Education of Daughters) 1787 में प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तक महिलाओं की शिक्षा पर एक प्रारंभिक लेकिन प्रभावशाली निबंध है, जिसमें वोल्स्टनक्राफ्ट तत्कालीन समाज में लड़कियों को दी जाने वाली शिक्षा की आलोचना करती हैं और इसके बजाय तर्क, आत्म-निर्भरता और नैतिक विकास पर आधारित शिक्षा की वकालत करती हैं। वह मानती हैं कि महिलाओं को केवल पुरुष को प्रसन्न करने या शादी करने के लिए प्रशिक्षित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें तर्कसंगत प्राणी के रूप में विकसित किया जाना चाहिए जो स्वतंत्र रूप से सोच सकें, अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर सकें और समाज में उपयोगी भूमिका निभा सकें। वह संवेदनशीलता की अत्यधिक प्रशंसा, दिखावे की संस्कृति और कठोर बोर्डिंग स्कूलों के नकारात्मक प्रभावों की निंदा करती हैं। वोल्स्टनक्राफ्ट का मानना है कि एक अच्छी शिक्षा लड़कियों को अच्छी पत्नियाँ, माताएँ और नागरिक बनने में मदद करेगी, जो स्वयं के और समाज के नैतिक उत्थान में योगदान देंगी। यह पुस्तक महिलाओं के अधिकारों पर उनके बाद के और अधिक प्रसिद्ध कार्यों का अग्रदूत थी।
किताब के अनुभाग
अनुभाग 1: नर्सरी
यह अनुभाग बचपन के प्रारंभिक वर्षों और माता-पिता की भूमिका पर केंद्रित है। वोल्स्टनक्राफ्ट बच्चों की शिक्षा में माता-पिता, विशेष रूप से माँ, के महत्व पर जोर देती हैं। वह नर्सरी में बच्चे के शुरुआती अनुभवों को महत्व देती हैं, जहाँ आदतों का निर्माण होता है। वह माता-पिता द्वारा अत्यधिक लाड़-प्यार या कठोरता दोनों की आलोचना करती हैं और बच्चे के स्वभाव को समझने और उसे सही दिशा में निर्देशित करने की वकालत करती हैं। उनका तर्क है कि बच्चों को कम उम्र से ही आत्म-नियंत्रण, आज्ञाकारिता और तर्क विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, न कि केवल उनकी इच्छाओं को पूरा किया जाना चाहिए।
| पात्र/संलग्न इकाई | विशेषताएँ | लक्ष्य/प्रेरणा (जैसा कि वोल्स्टनक्राफ्ट ने वर्णित किया है) |
|---|---|---|
| बेटियाँ (लड़कियाँ) | जन्म से तर्क करने और नैतिकता सीखने की क्षमता वाली; समाज द्वारा अक्सर सतही शिक्षा के लिए प्रेरित। | तर्कसंगत, आत्म-निर्भर, सदाचारी और समाज के लिए उपयोगी सदस्य बनना। |
| माता-पिता (विशेषकर माँ) | बच्चों के प्रारंभिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले; अक्सर प्रेम और लाड़-प्यार में गलतियाँ करने वाले। | अपनी बेटियों को तर्कसंगत और नैतिक प्राणी के रूप में शिक्षित करना, उन्हें समाज की चुनौतियों के लिए तैयार करना। |
| समाज | महिलाओं पर सतही गुणों और आकर्षकता पर ध्यान केंद्रित करने का दबाव डालने वाला; तर्कसंगतता की उपेक्षा करने वाला। | महिलाओं को केवल घरेलू दायरे तक सीमित रखना और उनकी बौद्धिक क्षमताओं को कम आंकना। |
| पुरुष | समाज में प्रभुत्व रखने वाले; अक्सर महिलाओं को अपनी खुशी के लिए साधन के रूप में देखने वाले। | अपनी पत्नियों और बेटियों में उन गुणों को देखना जो उनके व्यक्तिगत सुख को बढ़ाते हैं, न कि बौद्धिक विकास को। |
| शिक्षक/अभिभावक | बच्चों की शिक्षा में महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर माता-पिता के निर्देशों से बंधे हुए। | बच्चों को ज्ञान और कौशल प्रदान करना, लेकिन वोल्स्टनक्राफ्ट के अनुसार अक्सर सही नैतिक और बौद्धिक विकास पर ध्यान नहीं देना। |
अनुभाग 2: नैतिक अनुशासन और भावनाएँ
इस अनुभाग में, वोल्स्टनक्राफ्ट नैतिक अनुशासन और बच्चों की भावनाओं के उचित प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करती हैं। वह तर्क देती हैं कि बच्चों को सहानुभूति और परोपकारिता विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन उन्हें अत्यधिक संवेदनशीलता से भी बचना चाहिए, जिसे वह अक्सर दिखावटी और हानिकारक मानती हैं। उनका मानना है कि भावनाओं को तर्क द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए ताकि एक संतुलित और सदाचारी चरित्र का निर्माण हो सके। वह बच्चों को दूसरों के प्रति दयालुता और न्याय सिखाने की आवश्यकता पर जोर देती हैं, जो सच्ची नैतिकता का आधार है।
अनुभाग 3: महिला चरित्र
वोल्स्टनक्राफ्ट इस बात की पड़ताल करती हैं कि तत्कालीन समाज में महिला चरित्र कैसे निर्मित होता है और इसमें क्या कमियां हैं। वह आलोचना करती हैं कि लड़कियों को अक्सर केवल आकर्षक और पुरुषों को प्रसन्न करने के लिए शिक्षित किया जाता है, जिससे वे सतही, व्यर्थ और कमजोर बन जाती हैं। वह तर्क देती हैं कि ऐसी शिक्षा उन्हें वास्तविक गुणों और बौद्धिक शक्ति से वंचित करती है। वह एक ऐसे महिला चरित्र की कल्पना करती हैं जो तर्कसंगत, आत्म-निर्भर, मजबूत और नैतिक रूप से सुदृढ़ हो, न कि केवल बाहरी सुंदरता या कृत्रिम संवेदनशीलता पर आधारित हो।
अनुभाग 4: झूठी संवेदनशीलता पर
यह अनुभाग झूठी या अत्यधिक संवेदनशीलता के खतरों को उजागर करता है। वोल्स्टनक्राफ्ट का मानना है कि समाज लड़कियों को अत्यधिक भावुक होने और अपनी भावनाओं पर पूरी तरह से निर्भर रहने के लिए प्रोत्साहित करता है, जिससे वे तर्क की उपेक्षा करती हैं। वह इस तरह की संवेदनशीलता को दिखावा, आत्म-भोग और कमजोरी का संकेत मानती हैं, जो एक महिला को तर्कसंगत निर्णय लेने और वास्तविक जीवन की कठिनाइयों का सामना करने से रोकती है। वह सच्ची सहानुभूति और तर्कसंगतता के पक्ष में इस कृत्रिम भावुकता को अस्वीकार करती हैं।
अनुभाग 5: अत्यधिक भोग के हानिकारक प्रभाव पर
इस अनुभाग में, वोल्स्टनक्राफ्ट बच्चों को अत्यधिक भोग और लाड़-प्यार देने के नकारात्मक परिणामों पर चर्चा करती हैं। वह चेतावनी देती हैं कि यदि बच्चों को उनकी हर इच्छा पूरी करने दी जाए, तो वे स्वार्थी, मनमानी करने वाले और दूसरों के प्रति असंवेदनशील हो जाते हैं। उनका तर्क है कि ऐसी शिक्षा उन्हें अनुशासन, आत्म-नियंत्रण और दूसरों के अधिकारों के प्रति सम्मान सिखाने में विफल रहती है, जो एक सदाचारी व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं। वह बच्चों को सीमाओं को समझने और धैर्य विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करने की वकालत करती हैं।
अनुभाग 6: अच्छे स्वभाव के महत्व पर
यह अनुभाग एक अच्छे स्वभाव के महत्व पर प्रकाश डालता है। वोल्स्टनक्राफ्ट बताती हैं कि एक शांत, धैर्यपूर्ण और दयालु स्वभाव न केवल व्यक्ति के लिए बल्कि उसके आसपास के लोगों के लिए भी खुशी और शांति लाता है। वह तर्क देती हैं कि यह बचपन से ही विकसित किया जाना चाहिए और यह तर्क और आत्म-नियंत्रण का परिणाम है। वह मानती हैं कि एक अच्छा स्वभाव केवल एक बाहरी गुण नहीं है, बल्कि यह आंतरिक सद्गुण और नैतिक विकास का संकेत है।
अनुभाग 7: खुशी के गलत प्रेम के हानिकारक प्रभावों पर
वोल्स्टनक्राफ्ट इस बात पर चर्चा करती हैं कि खुशी की गलत या सतही खोज कैसे हानिकारक हो सकती है। वह उन लड़कियों की आलोचना करती हैं जिन्हें केवल मनोरंजन, पार्टियों और बाहरी सुखों की तलाश में रहने के लिए सिखाया जाता है। उनका तर्क है कि यह उन्हें गंभीर विचारों, बौद्धिक pursuits और स्थायी संतुष्टि से दूर कर देता है। वह मानती हैं कि सच्ची खुशी आंतरिक सद्गुण, ज्ञान और दूसरों के प्रति कर्तव्यनिष्ठा में पाई जाती है, न कि केवल क्षणभंगुर pleasures में।
अनुभाग 8: शालीनता पर
यह अनुभाग शालीनता (Propriety) के विचार की पड़ताल करता है। वोल्स्टनक्राफ्ट मानती हैं कि महिलाओं के लिए शालीनता महत्वपूर्ण है, लेकिन वह यह भी तर्क देती हैं कि इसकी व्याख्या अक्सर सतही और प्रतिबंधित तरीके से की जाती है। वह सच्ची शालीनता को बाहरी दिखावे या सामाजिक मानदंडों का अंधा पालन नहीं मानती, बल्कि इसे आंतरिक नैतिकता, आत्म-सम्मान और तर्कसंगत व्यवहार का परिणाम मानती हैं। वह कहती हैं कि महिलाओं को समाज द्वारा निर्धारित अनुचित प्रतिबंधों के बजाय, अपने स्वयं के विवेक और तर्क के आधार पर शालीनता विकसित करनी चाहिए।
अनुभाग 9: धर्म के महत्व पर
वोल्स्टनक्राफ्ट शिक्षा में धर्म की भूमिका पर चर्चा करती हैं। वह धर्म को नैतिक विकास और आंतरिक शांति के लिए महत्वपूर्ण मानती हैं, लेकिन वह कट्टरता या अंधविश्वास की आलोचना करती हैं। उनका मानना है कि धर्म को तर्कसंगत और नैतिक सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए, न कि केवल भावनात्मक उत्साह या बाहरी अनुष्ठानों पर। वह युवा लड़कियों को एक विचारशील और नैतिक तरीके से धर्म का अभ्यास करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, जो उनके चरित्र को मजबूत करे और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद करे।
अनुभाग 10: विपत्ति के लाभों पर
यह अनुभाग विपत्ति या कठिनाइयों का सामना करने के मूल्य पर केंद्रित है। वोल्स्टनक्राफ्ट तर्क देती हैं कि जीवन की चुनौतियाँ और कष्ट व्यक्ति को मजबूत, लचीला और समझदार बनाते हैं। वह अत्यधिक लाड़-प्यार में पली-बढ़ी लड़कियों की आलोचना करती हैं जो कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार नहीं होती हैं। उनका मानना है कि विपत्ति हमें आत्म-ज्ञान प्रदान करती है, हमारी सीमाओं को समझने में मदद करती है, और हमें दूसरों के प्रति सहानुभूति विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करती है। वह युवा लड़कियों को जीवन की वास्तविकताओं का सामना करने के लिए तैयार करने की वकालत करती हैं।
अनुभाग 11: बोर्डिंग-स्कूलों पर
वोल्स्टनक्राफ्ट बोर्डिंग-स्कूलों की कड़ी आलोचना करती हैं। वह मानती हैं कि ये संस्थान अक्सर लड़कियों को वास्तविक दुनिया से अलग कर देते हैं, उन्हें सतही गुणों, प्रतिस्पर्धा और दिखावे की संस्कृति में डुबो देते हैं। उनका तर्क है कि बोर्डिंग-स्कूल लड़कियों को एक दूसरे की बुरी आदतों को अपनाने और सच्ची नैतिक शिक्षा से वंचित करते हैं। वह यह भी कहती हैं कि इन स्कूलों में घर जैसा व्यक्तिगत ध्यान और नैतिक मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। वह घर-आधारित शिक्षा को प्राथमिकता देती हैं जहाँ माता-पिता बच्चों के नैतिक और बौद्धिक विकास पर सीधा प्रभाव डाल सकें।
अनुभाग 12: पुस्तकों के चुनाव पर
इस अनुभाग में, वोल्स्टनक्राफ्ट युवा लड़कियों के लिए पुस्तकों के उचित चुनाव के महत्व पर जोर देती हैं। वह उन उपन्यासों और कहानियों की आलोचना करती हैं जो केवल भावनाओं को उत्तेजित करती हैं और तर्क को बढ़ावा नहीं देतीं। वह मानती हैं कि पढ़ी जाने वाली पुस्तकें तर्क, नैतिकता और ज्ञान को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए। वह युवा पाठकों को सोचने, प्रश्न पूछने और अपने विचारों को विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करने वाली सामग्री की वकालत करती हैं, न कि केवल उनके दिमाग को निष्क्रिय रूप से मनोरंजन से भरने वाली।
अनुभाग 13: उपलब्धियों पर
वोल्स्टनक्राफ्ट "उपलब्धियों" (जैसे संगीत, नृत्य, सिलाई) के महत्व पर चर्चा करती हैं। वह इन कौशलों के मूल्य को पूरी तरह से नकारती नहीं हैं, लेकिन वह चेतावनी देती हैं कि इन्हें अत्यधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। वह मानती हैं कि ये केवल सतही गुण बन जाते हैं यदि इन्हें तर्क, नैतिकता और बौद्धिक विकास के साथ संतुलित न किया जाए। उनका तर्क है कि महिलाओं को केवल इन उपलब्धियों के माध्यम से आकर्षक दिखने के लिए प्रशिक्षित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें अपनी बुद्धि और चरित्र को विकसित करना चाहिए।
अनुभाग 14: कल्पना की खेती पर
यह अनुभाग कल्पना के महत्व पर केंद्रित है। वोल्स्टनक्राफ्ट कल्पना को एक शक्तिशाली उपकरण मानती हैं, लेकिन वह इसकी उचित खेती की आवश्यकता पर जोर देती हैं। वह चेतावनी देती हैं कि एक अनियंत्रित कल्पना हानिकारक हो सकती है, जिससे व्यक्ति दिवास्वप्न में खो जाता है और वास्तविकता से दूर हो जाता है। वह एक ऐसी कल्पना की वकालत करती हैं जिसे तर्क द्वारा नियंत्रित किया जाए, और जिसका उपयोग रचनात्मकता, सहानुभूति और नैतिक चिंतन को बढ़ावा देने के लिए किया जाए, न कि केवल निष्क्रिय मनोरंजन या अनावश्यक भय पैदा करने के लिए।
अनुभाग 15: मातृ स्नेह पर
वोल्स्टनक्राफ्ट मातृ स्नेह के पवित्र और महत्वपूर्ण स्वरूप पर चर्चा करती हैं। वह मानती हैं कि यह एक स्वाभाविक और शक्तिशाली बंधन है, लेकिन इसे तर्क और कर्तव्य से भी निर्देशित किया जाना चाहिए। वह उन माताओं की आलोचना करती हैं जो अपने बच्चों को अत्यधिक लाड़-प्यार देती हैं या उन्हें सही नैतिक मार्गदर्शन नहीं देती हैं। उनका तर्क है कि सच्ची मातृ स्नेह में बच्चों को तर्कसंगत, सदाचारी और आत्म-निर्भर व्यक्ति के रूप में तैयार करना शामिल है, न कि केवल उनकी हर इच्छा को पूरा करना।
अनुभाग 16: दोस्ती पर
यह अनुभाग दोस्ती के महत्व और प्रकृति की पड़ताल करता है। वोल्स्टनक्राफ्ट दोस्ती को एक मूल्यवान मानवीय संबंध मानती हैं, जो सम्मान, विश्वास और बौद्धिक समानता पर आधारित होनी चाहिए। वह सतही या लाभ-उन्मुख दोस्ती की आलोचना करती हैं। वह तर्क देती हैं कि सच्ची दोस्ती व्यक्तियों को बेहतर बनाती है और उनके नैतिक विकास में सहायता करती है। वह युवा लड़कियों को ऐसी दोस्ती विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं जो उनके विचारों को उत्तेजित करे और उन्हें चरित्र में मजबूत करे।
अनुभाग 17: शादी के बाद बेटियों की शिक्षा पर
इस अनुभाग में, वोल्स्टनक्राफ्ट शादी के बाद भी महिलाओं की शिक्षा जारी रखने की आवश्यकता पर जोर देती हैं। वह मानती हैं कि विवाह जीवन के अंत में शिक्षा का अंत नहीं होना चाहिए। उनका तर्क है कि एक पत्नी और माँ के रूप में भी, महिलाओं को अपने बौद्धिक और नैतिक विकास को जारी रखना चाहिए ताकि वे अपने परिवार और समाज में प्रभावी भूमिका निभा सकें। वह उन्हें तर्कसंगत साथी और समझदार माताएँ बनने के लिए लगातार सीखने और विकसित होने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।
अनुभाग 18: स्वभाव के प्रबंधन पर
वोल्स्टनक्राफ्ट स्वभाव (Temper) को नियंत्रित करने के महत्व पर ध्यान केंद्रित करती हैं। वह तर्क देती हैं कि एक शांत और संतुलित स्वभाव आंतरिक शांति और दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण संबंधों के लिए महत्वपूर्ण है। वह क्रोध, चिड़चिड़ापन और अन्य नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता पर जोर देती हैं, और मानती हैं कि यह तर्क और आत्म-अनुशासन के माध्यम से हासिल किया जा सकता है। वह बचपन से ही इस आत्म-नियंत्रण को विकसित करने की आवश्यकता पर जोर देती हैं।
अनुभाग 19: उद्योग की आदतों के शीघ्र अधिग्रहण की आवश्यकता पर
यह अनुभाग कम उम्र से ही उद्योग (Industry) और परिश्रम की आदतों को विकसित करने के महत्व पर प्रकाश डालता है। वोल्स्टनक्राफ्ट का तर्क है कि आलस्य और निष्क्रियता हानिकारक हैं, और युवा लड़कियों को उपयोगी गतिविधियों में संलग्न होने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। वह मानती हैं कि काम और कर्तव्य के प्रति समर्पण आत्मनिर्भरता, उद्देश्य की भावना और जीवन में संतुष्टि प्रदान करता है। यह शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के परिश्रम को शामिल करता है।
अनुभाग 20: अर्थव्यवस्था पर शीघ्र ध्यान देने की आवश्यकता पर
वोल्स्टनक्राफ्ट युवा लड़कियों के लिए अर्थव्यवस्था और विवेकपूर्ण प्रबंधन सीखने के महत्व पर जोर देती हैं। वह तर्क देती हैं कि महिलाओं को पैसे और संसाधनों का बुद्धिमानी से प्रबंधन करना सीखना चाहिए, न कि केवल फिजूलखर्ची करनी चाहिए। वह मानती हैं कि यह आत्मनिर्भरता और वित्तीय स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण है, और यह उन्हें अपने घरों और परिवारों को अधिक प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने में मदद करता है।
अनुभाग 21: निष्कर्ष
अपने निष्कर्ष में, वोल्स्टनक्राफ्ट अपनी मुख्य दलीलों को दोहराती हैं। वह एक तर्कसंगत और नैतिक शिक्षा के लिए अपने आह्वान को दोहराती हैं जो महिलाओं को न केवल आकर्षक पत्नियाँ बनाती है, बल्कि विचारशील, आत्मनिर्भर और समाज के लिए मूल्यवान सदस्य बनाती है। वह जोर देती हैं कि महिलाओं का सच्चा मूल्य उनकी बुद्धि, नैतिकता और सामाजिक उपयोगिता में निहित है, न कि केवल उनकी बाहरी सुंदरता या सतही उपलब्धियों में। वह समाज को महिलाओं की शिक्षा के प्रति अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने का आह्वान करती हैं ताकि वे एक अधिक न्यायपूर्ण और प्रबुद्ध समाज का निर्माण कर सकें।
साहित्यिक विधा: शैक्षिक निबंध, दार्शनिक निबंध, सामाजिक टीका
लेखक के कुछ डेटा:
मैरी वोल्स्टनक्राफ्ट (1759-1797) एक अंग्रेजी लेखिका, दार्शनिक और महिला अधिकारों की पक्षधर थीं। उन्हें अक्सर पहली नारीवादी दार्शनिकों में से एक माना जाता है। उनका जीवन unconventional था और उन्हें अपने समय में अपनी व्यक्तिगत पसंद और लेखन के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति 'ए विन्डिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमन' (A Vindication of the Rights of Woman, 1792) है, जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि महिलाएं पुरुषों से स्वाभाविक रूप से हीन नहीं हैं, बल्कि शिक्षा की कमी के कारण ऐसी दिखाई देती हैं। 'बेटियों की शिक्षा पर विचार' उनकी पहली पूरी किताब थी। वोल्स्टनक्राफ्ट उपन्यासकार मैरी शेली की माँ थीं, जो 'फ्रेंकस्टीन' की लेखिका थीं। उनका निधन प्रसव के दस दिन बाद 38 साल की उम्र में हो गया था।
नैतिक शिक्षा:
इस पुस्तक की मुख्य नैतिक शिक्षा यह है कि महिलाओं को पुरुषों के समान तर्कसंगत प्राणियों के रूप में शिक्षित किया जाना चाहिए। उन्हें केवल विवाह या पुरुष को प्रसन्न करने के लिए नहीं, बल्कि अपने बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास के लिए शिक्षित किया जाना चाहिए। सच्ची खुशी और सद्गुण दिखावे या क्षणभंगुर pleasures में नहीं, बल्कि आंतरिक विवेक, आत्म-नियंत्रण और समाज के प्रति कर्तव्य में निहित है। वोल्स्टनक्राफ्ट महिलाओं को आत्मनिर्भरता, तर्क और नैतिकता के गुणों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं ताकि वे बेहतर बेटियाँ, पत्नियाँ, माताएँ और अंततः बेहतर इंसान बन सकें।
जिज्ञासु तथ्य:
- यह मैरी वोल्स्टनक्राफ्ट की पहली प्रकाशित पूर्ण-लंबाई वाली पुस्तक थी, जो 1787 में उनके 28वें जन्मदिन से ठीक पहले आई थी।
- पुस्तक को मूल रूप से "जोसेफ जॉनसन की युवा देवियों की अकादमी" के लिए एक पाठ्यपुस्तक के रूप में लिखा गया था, जॉनसन एक प्रसिद्ध रेडिकल प्रकाशक थे और वोल्स्टनक्राफ्ट के संरक्षक थे।
- यह पुस्तक उनके अधिक प्रसिद्ध कार्य 'ए विन्डिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमन' (1792) के लिए एक महत्वपूर्ण पूर्वाभ्यास थी, जिसमें उन्होंने महिला शिक्षा और अधिकारों के बारे में अपने विचारों को और विकसित किया।
- वोल्स्टनक्राफ्ट ने अपनी पुस्तक में पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं और तत्कालीन समाज की महिला शिक्षा की सतही प्रकृति की आलोचना की, जो उनके समय के लिए काफी प्रगतिशील विचार थे।
- हालांकि यह उनके बाद के कार्यों जितनी कट्टरपंथी नहीं थी, इसने पहले ही "कारण" (reason) के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और महिलाओं के सशक्तिकरण में शिक्षा की भूमिका पर उनके विश्वास को प्रदर्शित कर दिया था।
