dematriyas - frederik shilar

सारांश

नाटक दिमित्रि, एक रहस्यमय युवा के इर्द-गिर्द घूमता है, जो खुद को रूसी त्सारेविच दिमित्रि, इवान द टेरिबल का छोटा बेटा होने का दावा करता है, जिसे मृत मान लिया गया था। पोलिश दरबार में शरण लेने के बाद, वह पोलिश राजकुमारी मरीना मनिषेक के साथ जुड़ जाता है और पोलैंड के राजा सिगिस्मंड III का समर्थन हासिल करता है। अपनी सेना के साथ, वह रूस पर आक्रमण करता है, त्सार बोरिस गोडुनोव की मृत्यु के बाद मास्को के सिंहासन पर कब्ज़ा कर लेता है। हालाँकि, उसकी सत्ता धीरे-धीरे रूसी कुलीन वर्ग, विशेष रूप से राजकुमार शुइस्की, के बीच संदेह और विरोध को जन्म देती है। उसकी असली पहचान पर सवाल उठते हैं, और जब वह मृत त्सारेविच की माँ, ज़ारिना मारिया, से मिलता है, तो उसकी पहचान का संकट गहरा जाता है। नाटक का उद्देश्य अंततः दिमित्रि के पतन और उसके धोखाधड़ी के उजागर होने पर केंद्रित था, लेकिन यह अधूरा रह गया।

किताब के अनुभाग

अनुभाग 1: पोलिश दरबार में दिमित्रि
दिमित्रि, एक युवा सैनिक, पोलैंड में आता है और दावा करता है कि वह इवान द टेरिबल का सबसे छोटा बेटा, त्सारेविच दिमित्रि है, जिसे आठ साल की उम्र में उगलिच में मृत मान लिया गया था। वह बताता है कि कैसे उसे मौत से बचाया गया था और गुप्त रूप से पाला गया था। वह पोलिश कुलीन वर्ग का ध्यान आकर्षित करता है और पोलिश राजकुमारी मरीना मनिषेक से मिलता है, जो उसकी महत्वाकांक्षा और करिश्मा से प्रभावित होती है। राजा सिगिस्मंड III, रूस में अपना प्रभाव बढ़ाने के अवसर को भांपते हुए, दिमित्रि के दावे का समर्थन करने का फैसला करता है। इस अनुभाग में दिमित्रि की शुरुआती पहचान का संघर्ष और पोलिश समर्थन हासिल करने के उसके प्रयास शामिल हैं।

पात्र विशेषताएँ प्रेरणाएँ
दिमित्रि नायक, युवा, करिश्माई, महत्वाकांक्षी, अपनी पहचान को लेकर अनिश्चित लेकिन सिंहासन का प्रबल दावेदार। रूस का सिंहासन हासिल करना, अपनी "सही" पहचान स्थापित करना, इवान द टेरिबल के बेटे के रूप में अपनी विरासत का दावा करना।
मरीना मनिषेक पोलिश राजकुमारी, महत्वाकांक्षी, चालाक, सुंदर। दिमित्रि के माध्यम से सत्ता और प्रभाव हासिल करना, रूस की ज़ारिना बनना।
किंग सिगिस्मंड III पोलैंड का राजा, राजनीतिक रूप से चतुर, अवसरवादी। दिमित्रि का उपयोग करके रूस पर पोलिश प्रभाव बढ़ाना, पोलैंड की शक्ति और क्षेत्र का विस्तार करना।
राजकुमार शुइस्की एक शक्तिशाली रूसी बोयार (कुलीन), दूरदर्शी, देशभक्त। रूस को एक धोखेबाज शासक से बचाना, रूस के "सही" शासक को स्थापित करना, अपनी और अन्य रूसी कुलीनों की शक्ति और प्रभाव को बनाए रखना।
रूस की ज़ारिना मारिया इवान द टेरिबल की विधवा, असली दिमित्रि की माँ (या कम से कम वह जिसका यह दावा है), दुःखी, बाद में संदेह से भरी। सच्चाई को सामने लाना, अपने मृत बेटे की स्मृति की रक्षा करना, रूस को धोखेबाज से बचाना।
पोलेव दिमित्रि का वफादार साथी, उसके रहस्य को जानता है। दिमित्रि के प्रति वफादारी, उसके साथ सत्ता में ऊपर उठना।

अनुभाग 2: रूस की ओर मार्च और प्रारंभिक सफलताएँ
दिमित्रि, पोलिश सेना और कोसैक समर्थन के साथ, रूस पर आक्रमण करता है। रूस में, त्सार बोरिस गोडुनोव दिमित्रि के उदय से चिंतित है और उसे एक धोखेबाज घोषित करता है। हालाँकि, बोरिस की अचानक मृत्यु हो जाती है, जिससे दिमित्रि के लिए रास्ता साफ हो जाता है। रूसी आबादी और सेना के एक बड़े हिस्से ने, जो बोरिस की तानाशाही से थक चुके थे और इवान द टेरिबल के वंशज को वापस चाहते थे, दिमित्रि का स्वागत किया। वह विजयी रूप से मास्को में प्रवेश करता है। इस अनुभाग में दिमित्रि की शुरुआती सैन्य सफलताएँ और रूसी सिंहासन की ओर उसका बढ़ता मार्च शामिल है।

अनुभाग 3: दिमित्रि का राज्याभिषेक और सत्ता की चुनौतियाँ
मास्को में, दिमित्रि को रूस के त्सार के रूप में ताज पहनाया जाता है। मरीना मनिषेक उसकी ज़ारिना बन जाती है। हालाँकि, रूसी कुलीन वर्ग, विशेष रूप से राजकुमार शुइस्की जैसे शक्तिशाली बोयार, उस पर संदेह करना शुरू कर देते हैं। दिमित्रि पोलिश रीति-रिवाजों को बढ़ावा देता है और पोलिश सलाहकारों पर बहुत अधिक भरोसा करता है, जिससे रूसी रूढ़िवादी चर्च और राष्ट्रीय गौरव को ठेस पहुँचती है। उसकी वास्तविक पहचान पर फुसफुसाहट बढ़ने लगती है। सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में से एक तब होता है जब वह ज़ारिना मारिया से मिलता है, जिसे असली दिमित्रि की माँ माना जाता है। हालाँकि, वह दिमित्रि को अपने बेटे के रूप में नहीं पहचानती है, बल्कि उसे एक धोखेबाज बताती है, जिससे नाटक का केंद्रीय पहचान संकट गहरा जाता है। यह खंड दिमित्रि के शासन की शुरुआत, उसकी बढ़ती असुरक्षा और उसके खिलाफ साजिशों के उभरने पर केंद्रित है।

अनुभाग 4: पहचान का संकट और अंतिम पतन
दिमित्रि का शासन अशांत हो जाता है। उसकी पहचान को लेकर संदेह बढ़ता है, खासकर ज़ारिना मारिया के खुले इनकार के बाद। वह खुद भी अपनी पहचान को लेकर आंतरिक संघर्ष से जूझ रहा होता है। शुइस्की और अन्य बोयार एक साजिश रचते हैं, जिसमें वे दिमित्रि को एक धोखेबाज के रूप में उजागर करने और उसे उखाड़ फेंकने की योजना बनाते हैं। दिमित्रि को अपनी वैधता बनाए रखने के लिए मजबूर होकर और अधिक कठोर और दमनकारी कदम उठाने पड़ते हैं, जिससे वह और अधिक अलोकप्रिय हो जाता है। नाटक के अपूर्ण स्वरूप के बावजूद, यह स्पष्ट है कि शिलर का इरादा दिमित्रि के धोखे के अंतिम उजागर होने और मास्को में एक हिंसक विद्रोह के दौरान उसकी हत्या के साथ समाप्त करने का था, जहाँ उसे एक ढोंगी के रूप में मार दिया जाता है। यह खंड दिमित्रि के शासन के अंतिम दिनों, उसकी पहचान के संकट की चरम सीमा और उसके आसन्न विनाश की ओर अग्रसर होने को दर्शाता है।

साहित्यिक शैली:
ऐतिहासिक नाटक, त्रासदी।

लेखक के बारे में:
फ्रेडरिक शिलर (1759-1805) एक प्रसिद्ध जर्मन कवि, दार्शनिक, इतिहासकार और नाटककार थे। उन्हें जर्मन साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण शख्सियतों में से एक माना जाता है और उन्हें जर्मन क्लासिकिज्म के प्रमुख आंकड़ों में से एक के रूप में देखा जाता है, जो गोएथे के साथ जुड़े हुए थे। उनके प्रसिद्ध नाटकों में 'डाई रोबेर' (The Robbers), 'वालेंस्टीन' (Wallenstein) त्रयी, 'मारिया स्टुअर्ट' (Maria Stuart) और 'विलियम टेल' (William Tell) शामिल हैं। 'दिमित्रि' उनके अंतिम नाटकों में से एक था, जो उनकी मृत्यु के कारण अधूरा रह गया।

नैतिकता:
नाटक, भले ही अधूरा हो, पहचान, वैधता, महत्वाकांक्षा और सत्ता के नाजुक स्वभाव के विषयों पर केंद्रित है। यह बताता है कि कैसे धोखा, भले ही वह शुरू में सफल हो, अंततः सच्चाई की खोज और न्याय की मांग का सामना करता है। यह नेतृत्व के लिए नैतिक आधार की आवश्यकता और एक शासक की वैधता के महत्व पर भी प्रकाश डालता है, क्योंकि एक धोखेबाज शासक पर भरोसा करना अंततः पतन का कारण बनता है।

जिज्ञासु तथ्य:

  • अधूरा काम: 'दिमित्रि' फ्रेडरिक शिलर का अंतिम नाटक था और 1805 में उनकी मृत्यु के कारण यह अधूरा रह गया। उन्होंने नाटक के लिए व्यापक शोध और योजना बनाई थी, लेकिन केवल कुछ ही दृश्य और रूपरेखाएं पूरी कर पाए थे।
  • ऐतिहासिक आधार: नाटक रूस के इतिहास में "टाइम ऑफ ट्रबल्स" (Smuta) नामक एक अशांत अवधि के दौरान हुई वास्तविक घटनाओं पर आधारित है। फॉल्स दिमित्रि I (ग्रिगोरी ओट्रेपीव) एक ऐतिहासिक व्यक्ति था जिसने 1605 से 1606 तक रूस पर शासन किया।
  • रूसी इतिहास में रुचि: शिलर ने अपने जीवन के अंत में रूसी इतिहास में गहरी रुचि विकसित की थी, और दिमित्रि की कहानी ने उन्हें वैधता, सत्ता और धोखे के विषयों को तलाशने का एक समृद्ध अवसर प्रदान किया था।
  • गोएथे का प्रभाव: शिलर के मित्र और समकालीन, जोहान वोल्फगैंग वॉन गोएथे, ने शिलर को दिमित्रि की कहानी को नाटक के रूप में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया था। गोएथे ने शिलर की मृत्यु के बाद नाटक को पूरा करने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हुए।
  • पहचान का संकट: दिमित्रि की पहचान का संकट नाटक का एक केंद्रीय विषय है, जो उसके आंतरिक संघर्ष और बाहरी दुनिया के साथ उसके संबंधों को आकार देता है। शिलर इस बात पर जोर देना चाहते थे कि कैसे एक धोखेबाज को अंततः अपनी ही पहचान के जाल में फंसना पड़ता है।