shakespeare par prastavana - saimual johnson

सारांश

सैम्युल जॉनसन का 'शेक्सपियर की प्रस्तावना' (Preface to Shakespeare) 1765 में उनके द्वारा संपादित विलियम शेक्सपियर के नाटकों के संस्करण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक गहन साहित्यिक आलोचना का कार्य है जो जॉनसन के शेक्सपियर के प्रति विचारों को प्रस्तुत करता है, उनकी प्रतिभा की प्रशंसा करता है और उनकी कथित कमियों पर भी विचार करता है। जॉनसन ने शेक्सपियर को एक महान लेखक के रूप में स्थापित किया जो मानव स्वभाव का सच्चा दर्पण है, उनकी कलाकृति सार्वभौमिक और कालातीत है क्योंकि यह प्रकृति का अनुकरण करती है। उन्होंने शेक्सपियर के नाटकों की आलोचना करने के लिए स्थापित शास्त्रीय नियमों, विशेष रूप से समय और स्थान की एकता (unities of time and place) को अस्वीकार किया, यह तर्क देते हुए कि दर्शक नाटक को वास्तविकता के रूप में नहीं बल्कि एक काल्पनिक प्रतिनिधित्व के रूप में समझते हैं। जॉनसन ने शेक्सपियर की कुछ त्रुटियों को भी स्वीकार किया, जैसे कि नैतिक उद्देश्य की कमी और कथानक की लापरवाही, लेकिन अंततः उनकी खूबियों को उनकी खामियों से कहीं अधिक बताया। यह प्रस्तावना 18वीं शताब्दी की आलोचनात्मक सोच का एक मील का पत्थर है और शेक्सपियर की प्रतिष्ठा को मजबूत करने में सहायक रही है।

किताब के अनुभाग

अनुभाग 1: शेक्सपियर की महानता का दावा और उनके दोष

जॉनसन अपनी प्रस्तावना की शुरुआत शेक्सपियर की महानता की पुष्टि करके करते हैं। वह तर्क देते हैं कि एक लेखक की दीर्घायु और उसकी कृतियों की पीढ़ी दर पीढ़ी लोकप्रियता उसकी प्रतिभा का सबसे बड़ा प्रमाण है। शेक्सपियर ने सदियों से अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है क्योंकि वह मानव स्वभाव को यथार्थवादी और सार्वभौमिक तरीके से दर्शाते हैं। जॉनसन के लिए, शेक्सपियर "प्रकृति के कवि" हैं, जो किसी विशेष युग या देश के रीति-रिवाजों का नहीं, बल्कि शाश्वत मानवीय भावनाओं और व्यवहारों का चित्रण करते हैं।

इस प्रारंभिक खंड में, जॉनसन शेक्सपियर की कुछ कथित त्रुटियों को भी स्वीकार करते हैं। वह बताते हैं कि शेक्सपियर अक्सर अपने नाटकों में नैतिक उद्देश्य की उपेक्षा करते हैं, गुण को दंडित कर सकते हैं और बुराई को पुरस्कृत कर सकते हैं, जिससे नैतिक प्रभाव कमजोर होता है। वह उनके द्वारा त्रासदी और कॉमेडी को मिलाने की भी आलोचना करते हैं, जिसे उस समय के शास्त्रीय नियमों के विपरीत माना जाता था। जॉनसन को लगता है कि शेक्सपियर अक्सर कथानक में लापरवाही बरतते हैं, और कुछ संवाद अनावश्यक रूप से जटिल या आडंबरपूर्ण होते हैं।

मुख्य अवधारणाएँ/तर्क और उनकी विशेषताएँ विशेषताएँ प्रेरणाएँ/उद्देश्य
शेक्सपियर (Shakespeare) विशेषताएँ: प्रकृति का कवि, मानव स्वभाव का गहरा चित्रकार, सार्वभौमिक अपील, कालातीत, दीर्घायु। दोष: नैतिक उद्देश्य की कमी, त्रासदी और कॉमेडी का अनुचित मिश्रण, कथानक में लापरवाही, आडंबरपूर्ण भाषा। उद्देश्य: जीवन को यथार्थवादी ढंग से चित्रित करना, मानवीय भावनाओं और अनुभवों को प्रस्तुत करना।
सैम्युल जॉनसन (Samuel Johnson) विशेषताएँ: यथार्थवादी आलोचक, व्यावहारिक, संतुलित, तटस्थ, शास्त्रीय नियमों के प्रति संदेहवादी लेकिन नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध। प्रेरणाएँ: शेक्सपियर का निष्पक्ष मूल्यांकन करना, साहित्यिक आलोचना के सिद्धांतों को स्थापित करना जो तर्क और अनुभव पर आधारित हों, आम समझ और पाठक के अनुभव को प्राथमिकता देना।
प्रकृति/मानव स्वभाव (Nature/Human Nature) विशेषताएँ: सार्वभौमिक, अपरिवर्तनीय, सभी संस्कृतियों और युगों में समान, शेक्सपियर की कला का मूल आधार। उद्देश्य: साहित्यिक सत्य का अंतिम मानदंड, शेक्सपियर की प्रतिभा का स्रोत और उनकी दीर्घायु का कारण।
शास्त्रीय नियम (Classical Rules) विशेषताएँ: औपचारिक, कठोर, कलात्मक स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने वाले, कभी-कभी अनावश्यक रूप से आरोपित। उद्देश्य: नाटक को व्यवस्थित और सुसंगत बनाना, लेकिन अक्सर यथार्थवाद और रचनात्मकता की कीमत पर।
आलोचक (Critics) विशेषताएँ: अक्सर पांडित्यपूर्ण, नियमों पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करने वाले, शेक्सपियर की प्रतिभा को समझने में विफल रहने वाले, पाठ में गलतियाँ निकालने वाले। (यहां जॉनसन ऐसे आलोचकों को संबोधित कर रहे हैं जो शेक्सपियर को केवल नियमों के आधार पर आंकते हैं।) प्रेरणाएँ: स्थापित साहित्यिक परंपराओं और नियमों को बनाए रखना, अपनी विद्वत्ता प्रदर्शित करना।

अनुभाग 2: नाटक में यथार्थवाद और एकताओं की आलोचना

इस अनुभाग में, जॉनसन शास्त्रीय एकताओं (unities) - विशेष रूप से समय और स्थान की एकता - के पारंपरिक सिद्धांत पर अपने प्रसिद्ध हमले को प्रस्तुत करते हैं। शास्त्रीय आलोचक यह मानते थे कि नाटक को उसी समय और स्थान पर घटित होना चाहिए जिसमें दर्शक इसे देख रहे हैं, ताकि भ्रम को बनाए रखा जा सके। जॉनसन इस तर्क को पूरी तरह से खारिज करते हैं। वह कहते हैं कि दर्शक कभी भी यह नहीं मानते कि वे वास्तव में जो कुछ भी मंच पर देख रहे हैं वह वास्तविक है। वे जानते हैं कि यह केवल एक प्रतिनिधित्व है। इसलिए, नाटक में समय या स्थान में परिवर्तन का कोई भी भ्रम नहीं टूटता है, क्योंकि कोई भ्रम था ही नहीं जिसे तोड़ने की आवश्यकता हो।

जॉनसन का तर्क है कि नाटक "वास्तविक से पूरी तरह अलग" है, और दर्शक "इसे एक प्रतिनिधित्व के रूप में देखते हैं, वास्तविकता के रूप में नहीं।" उनके लिए, एक नाटक का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन और शिक्षा है, न कि यथार्थवादी भ्रम पैदा करना। इसलिए, समय और स्थान की एकताएं केवल अनावश्यक बाधाएं हैं जो नाटककार की रचनात्मक स्वतंत्रता को सीमित करती हैं। वह केवल कार्य की एकता (unity of action) को महत्वपूर्ण मानते हैं, यह तर्क देते हुए कि नाटक में एक ही मुख्य कथानक होना चाहिए।

अनुभाग 3: शेक्सपियर की भाषा और पाठ्य समस्याएं

जॉनसन शेक्सपियर की भाषा की भी जांच करते हैं। वह स्वीकार करते हैं कि शेक्सपियर के पास एक "महान और व्यापक शब्दावली" थी, लेकिन यह भी मानते हैं कि उनकी भाषा अक्सर उनके पात्रों के अनुसार नहीं बदलती थी। एक राजा और एक सामान्य व्यक्ति दोनों एक ही तरह से बात कर सकते हैं, जिससे यथार्थवाद कम होता है। जॉनसन शेक्सपियर के छंदों की अनियमितता और उनके नाटक की संरचना में लापरवाही पर भी ध्यान देते हैं।

जॉनसन इस खंड में पाठ्य आलोचना के मुद्दों पर भी चर्चा करते हैं। वह अपने पाठ को संपादित करने में आने वाली कठिनाइयों का वर्णन करते हैं, क्योंकि शेक्सपियर के मूल पाठ अक्सर मुद्रण की त्रुटियों, संपादकों द्वारा मनमानी संशोधनों और अक्षम प्रतिलेखन के कारण भ्रष्ट हो गए थे। जॉनसन का उद्देश्य शेक्सपियर के मूल इरादे को बहाल करना था, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य था और कुछ स्थानों पर व्याख्या अनिश्चित बनी हुई थी। वह पुराने संपादकों की आलोचना करते हैं जिन्होंने पाठ को समझे बिना मनमाने ढंग से बदल दिया।

अनुभाग 4: शेक्सपियर की सार्वभौमिक अपील का निष्कर्ष

अपनी प्रस्तावना के अंत में, जॉनसन शेक्सपियर की प्रतिभा के मुख्य तर्क को दोहराते हैं: कि शेक्सपियर मानव स्वभाव के एक सच्चे दर्पण हैं। उनकी कलाकृति किसी विशेष फैशन या समय-सीमा से बंधी नहीं है, बल्कि सभी युगों और स्थानों के लिए प्रासंगिक है क्योंकि यह मूलभूत मानवीय भावनाओं और अनुभवों को दर्शाती है। जॉनसन का तर्क है कि शेक्सपियर के पात्र सामान्य मनुष्य हैं, उनकी भावनाएं और विचार सार्वभौमिक हैं, यही कारण है कि उनके नाटक आज भी इतने शक्तिशाली और प्रभावशाली बने हुए हैं।

जॉनसन शेक्सपियर के दोषों को स्वीकार करते हुए भी निष्कर्ष निकालते हैं कि उनकी खूबियां कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। वह शेक्सपियर को उन लेखकों में से एक मानते हैं जिनकी महानता का अंदाजा उनके दर्शकों की आम राय से लगाया जा सकता है, जो समय के साथ उनकी लोकप्रियता को बनाए रखते हैं। वह शेक्सपियर को अंग्रेजी साहित्य के एक केंद्रीय और शाश्वत व्यक्ति के रूप में स्थापित करते हैं।

साहित्यिक शैली

साहित्यिक आलोचना (Literary Criticism), निबंध (Essay)

लेखक के बारे में तथ्य

सैम्युल जॉनसन (1709-1784) 18वीं शताब्दी के सबसे प्रभावशाली अंग्रेजी साहित्यिक व्यक्तित्वों में से एक थे। वह एक कवि, निबंधकार, नैतिकवादी, साहित्यिक आलोचक, जीवनी लेखक और लेक्सिकोग्राफर थे। उनका सबसे प्रसिद्ध कार्य 'ए डिक्शनरी ऑफ द इंग्लिश लैंग्वेज' (A Dictionary of the English Language) है, जिसे उन्होंने नौ वर्षों में पूरा किया और 1755 में प्रकाशित किया। जॉनसन को उनके प्रभावशाली निबंधों, जैसे 'द रैम्बलर' और 'द इडलर' के लिए भी जाना जाता है। उनकी 'लाइव्स ऑफ द मोस्ट एमिनेंट इंग्लिश पोएट्स' (Lives of the Most Eminent English Poets) अंग्रेजी साहित्य की जीवनी और आलोचना का एक महत्वपूर्ण संग्रह है। उन्हें अक्सर "डॉक्टर जॉनसन" के नाम से जाना जाता है और उन्हें अंग्रेजी साहित्य के इतिहास में एक प्रमुख व्यक्ति माना जाता है।

नैतिक शिक्षा

'शेक्सपियर की प्रस्तावना' की मुख्य नैतिक शिक्षा यह है कि सच्ची साहित्यिक महानता किसी विशेष नियम-पुस्तिका या फैशनेबल प्रवृत्ति का पालन करने में नहीं, बल्कि सार्वभौमिक मानव स्वभाव को सच्चाई से चित्रित करने में निहित है। जॉनसन हमें सिखाते हैं कि हमें अपनी आलोचनात्मक सोच में व्यावहारिक और अनुभव-आधारित होना चाहिए, और कठोर, कृत्रिम नियमों को कलात्मक स्वतंत्रता या वास्तविक प्रतिभा पर हावी नहीं होने देना चाहिए। साहित्यिक कृतियों का मूल्यांकन अंततः उनके कालातीत प्रभाव और मानव अनुभव को दर्शाने की उनकी क्षमता पर आधारित होना चाहिए।

जिज्ञासाएँ

  • 'शेक्सपियर की प्रस्तावना' पहली बार 1765 में जॉनसन के विलियम शेक्सपियर के आठ-खंडीय संस्करण के हिस्से के रूप में प्रकाशित हुई थी।
  • जॉनसन का यह संस्करण एक महत्वपूर्ण विद्वत्तापूर्ण प्रयास था, जिसमें उन्होंने शेक्सपियर के नाटकों को संपादित करने और टिप्पणियाँ प्रदान करने में दशकों का समय बिताया।
  • यह प्रस्तावना उस समय के नवशास्त्रीय आलोचनात्मक सिद्धांतों, विशेष रूप से फ्रांसीसी आलोचकों द्वारा पोषित शास्त्रीय एकताओं के प्रति जॉनसन के खुले विरोध के लिए प्रसिद्ध है।
  • जॉनसन की आलोचनात्मक शैली उनके व्यावहारिक दृष्टिकोण और आम समझ पर जोर देने के लिए उल्लेखनीय है, जो अक्सर उनके समय के अकादमिक पांडित्य से भिन्न थी।
  • यह प्रस्तावना आज भी शेक्सपियर के विद्वानों और 18वीं शताब्दी के साहित्यिक आलोचना के अध्ययन के लिए एक आवश्यक पाठ मानी जाती है।