El existencialismo es un humanismo

सारांश

जीन-पॉल सार्त्र की 'अस्तित्ववाद एक मानवतावाद है' मूल रूप से 1945 में दिया गया एक व्याख्यान है, जिसमें सार्त्र अस्तित्ववादी दर्शन का बचाव करते हैं और उसकी गलतफहमियों को दूर करते हैं। यह तर्क देता है कि "अस्तित्व सार से पहले है," जिसका अर्थ है कि मनुष्य पहले अस्तित्व में आते हैं, फिर अपने कार्यों और विकल्पों के माध्यम से अपने सार (पहचान, मूल्य, उद्देश्य) को परिभाषित करते हैं। मनुष्य पूरी तरह से स्वतंत्र हैं और अपने हर चुनाव के लिए जिम्मेदार हैं, न केवल अपने लिए बल्कि पूरी मानवता के लिए भी। यह स्वतंत्रता और जिम्मेदारी मनुष्य में "पीड़ा" (anguish), "परित्याग" (abandonment) और "निराशा" (despair) की भावनाएँ पैदा करती है, लेकिन साथ ही उन्हें अपने मूल्यों और अर्थों का निर्माण करने की शक्ति भी देती है। सार्त्र का तर्क है कि अस्तित्ववाद निराशावादी या निष्क्रिय नहीं है, बल्कि यह एक आशावादी दर्शन है जो मनुष्य को अपनी नियति का निर्माता बनने के लिए प्रेरित करता है, जिससे वे अपनी पसंद से एक सार्वभौमिक मूल्य प्रणाली का निर्माण करते हैं, और इस प्रकार यह वास्तव में एक मानवतावादी दर्शन है।

किताब के अनुभाग

अनुभाग 1: व्याख्यान का संदर्भ और उद्देश्य

यह अनुभाग सार्त्र के व्याख्यान की पृष्ठभूमि निर्धारित करता है। सार्त्र बताते हैं कि अस्तित्ववाद पर विभिन्न हलकों से हमला किया जा रहा है – कम्युनिस्ट इसे निष्क्रिय और बुर्जुआ मानते हैं, ईसाई इसे नास्तिक और अनैतिक मानते हैं। इन आलोचनाओं के जवाब में, सार्त्र का लक्ष्य अस्तित्ववाद की प्रकृति को स्पष्ट करना और यह दिखाना है कि यह वास्तव में एक आशावादी, क्रिया-उन्मुख और मानवतावादी दर्शन है, न कि निराशावादी दर्शन। वह यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि अस्तित्ववाद केवल विशेषज्ञों के लिए नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो मानव अस्तित्व के मौलिक सवालों पर विचार करता है।

अनुभाग 2: अस्तित्व सार से पहले है

यह सार्त्र के अस्तित्ववाद का मूल सिद्धांत है। सार्त्र यह समझाने से शुरू करते हैं कि कैसे एक कुर्सी या चाकू जैसी वस्तु का पहले एक सार (एक अवधारणा या डिज़ाइन) होता है, और फिर उसे बनाया जाता है। लेकिन मनुष्य के लिए ऐसा नहीं है। मनुष्य का कोई पूर्व-निर्धारित सार या प्रकृति नहीं है जो उसके अस्तित्व से पहले हो। इसके बजाय, मनुष्य पहले इस दुनिया में "फेंका" जाता है, अस्तित्व में आता है, और उसके बाद ही वह अपने कार्यों, विकल्पों और अनुभवों के माध्यम से अपना सार बनाता और परिभाषित करता है।

इससे पता चलता है कि मानव अपनी पहचान या उद्देश्य को बनाने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र और जिम्मेदार है। चूंकि कोई भगवान या पूर्व-निर्धारित मानवीय प्रकृति नहीं है, मनुष्य अपनी पसंद के माध्यम से खुद को परिभाषित करने के लिए बाध्य है। यह "पूर्ण स्वतंत्रता" की अवधारणा को जन्म देता है, जो सार्त्र के दर्शन के लिए केंद्रीय है।

अवधारणा / शब्द विशेषताएँ प्रेरणाएँ / भूमिका
अस्तित्व व्यक्ति का होना, अनुभव करना, दुनिया में मौजूद होना। मानव अनुभव का शुरुआती बिंदु; यह सार से पहले आता है।
सार किसी चीज की आंतरिक प्रकृति, पहचान, उद्देश्य। मनुष्यों के लिए पूर्व-निर्धारित नहीं; इसे अस्तित्व में आने के बाद बनाया जाता है।
मनुष्य जागरूक, स्वतंत्र, उत्तरदायी प्राणी। अपनी पहचान और मूल्यों का निर्माता; अपने विकल्पों के माध्यम से खुद को परिभाषित करता है।
पूर्ण स्वतंत्रता किसी भी पूर्व-निर्धारित बाधा से मुक्त होने की क्षमता। मानव जिम्मेदारी का आधार; मनुष्य को अपने सभी विकल्पों के लिए जवाबदेह बनाता है।
पीड़ा (Anguish) यह महसूस करना कि हमारे चुनाव न केवल हमें बल्कि पूरी मानवता को प्रभावित करते हैं। जिम्मेदारी के बोझ का अनुभव; दूसरों के लिए उदाहरण स्थापित करने का ज्ञान।
परित्याग (Abandonment) यह अहसास कि कोई ईश्वर नहीं है और कोई पूर्व-निर्धारित नैतिक मार्गदर्शक नहीं है। नैतिकता के स्रोत के रूप में स्वयं पर निर्भरता; अपनी पसंद के लिए स्वयं जिम्मेदार होना।
निराशा (Despair) किसी भी ऐसी संभावना की उपेक्षा करना जो हमारे नियंत्रण में नहीं है। केवल उन्हीं चीजों पर ध्यान केंद्रित करना जो हमारी शक्ति में हैं; कार्रवाई और प्रतिबद्धता पर जोर देना।

अनुभाग 3: मानव स्वतंत्र है और जिम्मेदार है

इस खंड में सार्त्र "अस्तित्व सार से पहले है" के निहितार्थों पर गहराई से विचार करते हैं।

  • पीड़ा (Anguish): क्योंकि मनुष्य अपने विकल्पों के माध्यम से अपने सार को बनाता है, और कोई वस्तुनिष्ठ नैतिक मार्गदर्शक नहीं है, हर चुनाव भारी जिम्मेदारी के साथ आता है। जब हम चुनाव करते हैं, तो हम न केवल अपने लिए, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक आदर्श बनाते हैं। हम खुद से पूछते हैं, "अगर हर कोई मेरी तरह काम करता, तो क्या यह सही होता?" यह अहसास "पीड़ा" को जन्म देता है – यह ज्ञान कि हम अकेले जिम्मेदार हैं और हमारा हर कार्य सार्वभौमिक निहितार्थ रखता है।
  • परित्याग (Abandonment): चूंकि कोई ईश्वर नहीं है और इसलिए कोई पूर्व-निर्धारित नैतिक कानून या आदेश नहीं है, मनुष्य को "परित्यक्त" कर दिया गया है। कोई ऊपरवाला मार्गदर्शक या उद्देश्यपूर्ण मूल्य नहीं हैं। हमें खुद ही अपने मूल्यों का आविष्कार करना होगा। यह हमें अकेला छोड़ देता है, बिना किसी बहाने के, अपनी पसंद के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार। सार्त्र प्रसिद्ध रूप से कहते हैं, "मनुष्य को स्वतंत्र होने की निंदा की जाती है।"
  • निराशा (Despair): सार्त्र बताते हैं कि हमें केवल उन्हीं चीजों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो हमारे नियंत्रण में हैं: हमारी अपनी कार्रवाई और प्रतिबद्धता। हमें उन सभी संभावनाओं को त्याग देना चाहिए जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं (जैसे दूसरों का व्यवहार या भविष्य के परिणाम)। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें निष्क्रिय होना चाहिए, बल्कि इसके विपरीत, हमें केवल अपनी कार्रवाई पर भरोसा करके कार्य करना चाहिए और उसके परिणाम के बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए जिसे हम नियंत्रित नहीं कर सकते।

अनुभाग 4: चयन और सार्वभौमिकता

सार्त्र का तर्क है कि जब हम चुनाव करते हैं, तो हम केवल अपने लिए चुनाव नहीं कर रहे होते हैं; हम एक सार्वभौमिक मूल्य का निर्माण कर रहे होते हैं। हम यह मान लेते हैं कि हमारा चुनाव सभी के लिए वैध है। अगर मैं शादी करने का फैसला करता हूं, तो मैं यह कह रहा हूं कि शादी करना सभी के लिए एक अच्छा विकल्प है। यह हमें एक "अच्छे विश्वास" (good faith) में रहने के लिए मजबूर करता है, जहां हम अपनी स्वतंत्रता और जिम्मेदारी को स्वीकार करते हैं, इसके विपरीत "बुरे विश्वास" (bad faith) के, जहां हम अपनी स्वतंत्रता से बचने की कोशिश करते हैं और खुद को वस्तु या नियति का शिकार मानते हैं। अस्तित्ववाद किसी को भी स्वयं को वस्तु के रूप में देखने या अपने विकल्पों की जिम्मेदारी से बचने की अनुमति नहीं देता है। किसी के जुनून या कथित मजबूरी को बहाने के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

अनुभाग 5: अस्तित्ववाद एक मानवतावाद क्यों है

अपने निष्कर्ष में, सार्त्र यह स्पष्ट करते हैं कि अस्तित्ववाद वास्तव में एक मानवतावादी दर्शन है। यह भगवान या किसी सार्वभौमिक सार में विश्वास करने के बजाय मनुष्य को अपने कानूनों का निर्माता, अपने मूल्यों का निर्माता और अपने उद्देश्य का निर्माता बनाता है। यह मनुष्य को अपने सार का निर्माण करने के लिए लगातार कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे वह अपनी नियति का पूर्ण स्वामी बन जाता है। यह व्यक्ति के गरिमा और उसके अपने जीवन के अर्थ को आकार देने की क्षमता पर जोर देता है। यह कोई निराशावादी दर्शन नहीं है जो मनुष्य को निष्क्रिय कर देता है, बल्कि यह एक ऐसा दर्शन है जो मनुष्य को अपनी पूरी जिम्मेदारी लेने और अपने विकल्पों के माध्यम से खुद को और दुनिया को सक्रिय रूप से बनाने के लिए सशक्त बनाता है। मनुष्य को अपनी पसंद से ही अपने अस्तित्व को परिभाषित करना होता है, और यही वह भारी जिम्मेदारी है जो उसे गौरवशाली भी बनाती है।


शैली: दार्शनिक निबंध, व्याख्यान।

लेखक के बारे में:
जीन-पॉल सार्त्र (1905-1980) एक फ्रांसीसी दार्शनिक, नाटककार, उपन्यासकार, पटकथा लेखक, राजनीतिक कार्यकर्ता और साहित्यिक आलोचक थे। वह 20वीं सदी के प्रमुख व्यक्ति थे और अस्तित्ववाद के दर्शन और घटना विज्ञान के प्रमुख आंकड़ों में से एक थे। सार्त्र को 1964 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि एक लेखक को "संस्था में तब्दील नहीं होना चाहिए।" उनके सबसे प्रसिद्ध कार्यों में 'बीइंग एंड नथिंगनेस' (Being and Nothingness), 'नो एग्जिट' (No Exit) और 'एक्ज़िस्टेंशियलिज़्म इज़ अ ह्यूमनिज़्म' (Existentialism is a Humanism) शामिल हैं।

नैतिक शिक्षा:
इस पुस्तक की मुख्य नैतिक शिक्षा यह है कि मनुष्य पूरी तरह से स्वतंत्र हैं और अपने सभी विकल्पों के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। चूंकि कोई पूर्व-निर्धारित मानवीय प्रकृति या दैवीय आदेश नहीं है, इसलिए मनुष्य को अपने स्वयं के मूल्यों और जीवन के अर्थ का आविष्कार करना चाहिए। यह जिम्मेदारी भारी हो सकती है, लेकिन यह मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता बनने और एक प्रामाणिक जीवन जीने का अवसर भी देती है। हमें अपनी स्वतंत्रता का सामना करना चाहिए और अपनी पसंद के लिए ईमानदारी से जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

जिज्ञासाएँ:

  • 'अस्तित्ववाद एक मानवतावाद है' मूल रूप से 29 अक्टूबर 1945 को पेरिस में क्लब में दिया गया एक व्याख्यान था। इसकी लोकप्रियता और सरलता के कारण इसे बाद में प्रकाशित किया गया।
  • व्याख्यान के बाद, सार्त्र ने बाद में इसके कुछ हिस्सों के बारे में आरक्षण व्यक्त किया। उन्होंने महसूस किया कि यह अस्तित्ववाद का बहुत सरलीकृत संस्करण था, और विशेष रूप से मार्क्सवादी दर्शन के साथ मेल खाने के अपने प्रयासों में, इसने अपनी कुछ दार्शनिक कठोरता खो दी थी।
  • यह व्याख्यान 1940 के दशक के उत्तरार्ध में अस्तित्ववाद के अत्यधिक लोकप्रिय होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था, जिससे इसे व्यापक दर्शकों तक पहुँचाया गया।
  • यह पुस्तक सार्त्र के उन आलोचकों को संबोधित करने का प्रयास थी जो अस्तित्ववाद को निराशावादी, अनैतिक और निष्क्रिय मानते थे, यह तर्क देते हुए कि यह वास्तव में क्रिया और प्रतिबद्धता पर जोर देता है।