मोटी औरत - गाय दे मोपासाँ
सारांश
'बूले दे सुइफ' (Boule de Suif) फ्रांसीसी लेखक गाइ दे मोपासाँ की एक प्रसिद्ध लघु कथा है, जो 1870-71 के फ्रेंको-प्रशिया युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है। कहानी एक ऐसे चरण को दर्शाती है जब प्रशियाई सेना ने रूएन शहर पर कब्ज़ा कर लिया है। शहर से भागने की कोशिश कर रहे दस यात्रियों का एक समूह एक स्टेजकोच में सवार होकर डीपेप की ओर निकलता है। इस समूह में विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोग शामिल हैं: दो कुलीन जोड़े (कॉर्नुडेट्स और कैर्रे-लमाडॉन), एक कुलीन काउंट और काउंटेस (डी ब्रिविल), दो नन, और एक क्रांतिकारी डेमोक्रेट जिसका नाम कॉर्नेट है। इन सबके साथ एक वेश्या, एलिज़ाबेथ रौसेट, जिसे 'बूले दे सुइफ' (मोटे चर्बी का गोला) के नाम से जाना जाता है, भी यात्रा कर रही है।
यात्रा के दौरान, जब वे भूख से पीड़ित होते हैं, तो बूले दे सुइफ उदारतापूर्वक अपने साथ लाया हुआ भोजन यात्रियों के साथ साझा करती है, जबकि बाकी सभी ने अपना खाना छिपा रखा था। वे एक सराय में रुकते हैं, जहाँ एक प्रशियाई अधिकारी उन्हें आगे जाने की अनुमति देने से इनकार कर देता है जब तक कि बूले दे सुइफ उसके साथ रात न बिताए। अन्य यात्री, जो पहले उसे नीच मानते थे, अब अपनी यात्रा जारी रखने के लिए उस पर दबाव डालते हैं। अपनी मातृभूमि और सह-यात्रियों के लिए अपनी इच्छा के विरुद्ध, वह अधिकारी के साथ सोने के लिए सहमत हो जाती है। अगले दिन, उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति मिल जाती है। हालाँकि, एक बार जब बूले दे सुइफ ने उनकी मदद कर दी है, तो वे फिर से उसे तिरस्कृत करने लगते हैं, उसका उपहास करते हैं और उसे अलग-थलग कर देते हैं। वे सब एक साथ भोजन करते हैं, जबकि वह भूखी और अकेली रोती रहती है, जिसे उन्होंने अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया था। कहानी सामाजिक पाखंड, वर्ग भेद और युद्ध की नैतिकता पर एक तीखा व्यंग्य है।
किताब के अनुभाग
अनुभाग 1: रूएन से पलायन और पात्रों का परिचय
1870-71 के फ्रेंको-प्रशिया युद्ध के दौरान, रूएन शहर पर प्रशियाई सेना का कब्ज़ा हो गया है। फ्रांसीसी प्रतिरोध के कुछ अंतिम गढ़ों में से एक होने के कारण, शहर में तनाव और भय व्याप्त है। प्रशियाई सैनिक पूरे शहर में घूमते हैं, नागरिकों को आतंकित करते हैं और घरों को लूटते हैं। कई नागरिक शहर से भागने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे ही माहौल में, दस यात्रियों का एक विविध समूह एक स्टेजकोच में सवार होकर रूएन से डीपेप की ओर जाने का फैसला करता है। इस समूह में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग शामिल हैं, जो सभी अपनी जान या संपत्ति बचाने की फिराक में हैं।
यह पहला अनुभाग विभिन्न पात्रों का परिचय कराता है और उनके प्रारंभिक व्यवहार को स्थापित करता है, खासकर जब वे प्रशियाई कब्जे के तहत डरे हुए और चिंतित होते हैं। वे सब एक-दूसरे से अपनी सामाजिक स्थिति और वर्ग के आधार पर दूरी बनाए रखते हैं।
| नाम | विशेषताएँ | प्रेरणाएँ |
|---|---|---|
| बूले दे सुइफ (एलिज़ाबेथ रौसेट) | एक वेश्या, जिसे उसके मोटे शरीर के कारण "बूले दे सुइफ" (चर्बी का गोला) कहा जाता है। वह प्यारी, दयालु, देशभक्त और भावनाओं से भरी है। | प्रशियाई कब्जे से भागना, अपनी मातृभूमि फ्रांस के प्रति वफादारी, अन्य फ्रांसीसी नागरिकों की मदद करने की इच्छा, अपनी गरिमा बनाए रखने की कोशिश, भले ही उसका पेशा उसे नीचा दिखाता हो। |
| मोसिएल और मैडम कॉर्नुडेट | मध्यम वर्ग के व्यापारी, शराब के थोक विक्रेता। वे डरपोक, मौकापरस्त और अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने के इच्छुक हैं। | अपनी जान और संपत्ति को प्रशियाई सैनिकों से बचाना, अपनी व्यावसायिक गतिविधियों को जारी रखना, अपनी सामाजिक स्थिति को बनाए रखना। |
| मोसिएल और मैडम कैर्रे-लमाडॉन | उच्च वर्ग के धनी उद्योगपति, वे अहंकारी, पाखंडी और स्वार्थी हैं। | अपनी प्रतिष्ठा और धन को सुरक्षित रखना, सामाजिक सीढ़ी पर चढ़ने की इच्छा, जर्मन उत्पीड़न से बचना। |
| काउंट और काउंटेस डी ब्रिविल | पुराने कुलीन वर्ग के सदस्य। वे ढोंगी, अवसरवादी और अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति अत्यधिक सचेत हैं। | अपने परिवार के नाम और स्थिति का संरक्षण, प्रशियाई लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना ताकि कोई परेशानी न हो, व्यक्तिगत आराम और सुरक्षा। |
| दो नन | धार्मिक, शांत और दयालु दिखने वाली, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से स्वार्थी और सामाजिक मानदंडों से प्रभावित। | अपनी धार्मिक प्रतिज्ञाओं का पालन करना, सुरक्षा की तलाश करना, प्रशियाई कब्जे से बचकर अपनी जान बचाना। |
| मोसिएल कॉर्नेट | एक क्रांतिकारी डेमोक्रेट, राजनीतिक रूप से सक्रिय और देशभक्त। | फ्रांसीसी गणराज्य के प्रति अपनी निष्ठा का पालन करना, प्रशियाई आक्रमणकारियों का विरोध करना, अपनी राजनीतिक विचारधाराओं के लिए लड़ना। |
अनुभाग 2: यात्रा, भूख और बूले दे सुइफ की उदारता
स्टेजकोच धीरे-धीरे रूएन से निकलकर ग्रामीण इलाकों की ओर बढ़ता है। रास्ते में ठंड और भूख यात्रियों को परेशान करने लगती है। सभी यात्री अपने-अपने खान-पान के बारे में चुप रहते हैं, कोई भी अपना भोजन दूसरों के साथ साझा करने की पेशकश नहीं करता। हर कोई अपनी सामाजिक श्रेष्ठता बनाए रखने या अपनी कंजूसी छिपाने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि, बूले दे सुइफ, जिसे बाकी लोग घृणा की दृष्टि से देखते हैं, अपने साथ लाई हुई खाने की एक बड़ी टोकरी खोलती है। उसमें चिकन, पाव, सॉसेज और शराब जैसी चीजें हैं। जब वह देखती है कि बाकी यात्री भूखे हैं, तो अपनी अच्छी प्रकृति के कारण वह उदारतापूर्वक अपना भोजन सबके साथ साझा करने की पेशकश करती है। बाकी यात्री, अपनी भूख के कारण, हिचकिचाते हुए उसके भोजन को स्वीकार करते हैं और खाते हैं। इस समय, सामाजिक अवरोध टूटते हुए प्रतीत होते हैं क्योंकि सभी एक साथ खाते हैं। बूले दे सुइफ अपनी देशभक्ति की भावनाओं और प्रशियाई सैनिकों के प्रति अपनी घृणा को स्पष्ट रूप से व्यक्त करती है, जिससे बाकी लोग, जो राजनीतिक रूप से कम मुखर हैं, असहज महसूस करते हैं।
अनुभाग 3: टॉटस में पड़ाव और प्रशियाई अधिकारी की मांग
यात्रा जारी रहती है, लेकिन टॉटस नामक एक छोटे से शहर में पहुँचने पर, स्टेजकोच को रोक दिया जाता है। यात्रियों को पता चलता है कि प्रशियाई अधिकारी ने उन्हें आगे जाने की अनुमति नहीं दी है। उन्हें रात शहर की एक सराय में बितानी पड़ती है, और अगले दिन भी वे फँसे रहते हैं। कुछ अधिकारी के पास जाकर अनुमति लेने की कोशिश करते हैं, लेकिन असफल रहते हैं।
शाम को, सराय का मालिक यात्रियों को बताता है कि प्रशियाई अधिकारी ने बूले दे सुइफ को अपने कमरे में बुलाया है। अधिकारी उससे एक निजी मुलाकात की मांग कर रहा है, जिसका अर्थ स्पष्ट है कि वह उसके साथ सोना चाहता है। बूले दे सुइफ गुस्से से इनकार कर देती है, वह प्रशियाई दुश्मन के साथ ऐसा कुछ भी करने से खुद को अपमानित महसूस करती है। उसे एक 'देशभक्त' वेश्या के रूप में, यह दुश्मन के आगे झुकना लगेगा।
अनुभाग 4: यात्रियों का दबाव और बूले दे सुइफ का दुविधा
बूले दे सुइफ के इनकार से अन्य यात्री चिंतित हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी यात्रा अब अनिश्चित काल के लिए रुक गई है। वे बूले दे सुइफ को अपनी यात्रा जारी रखने की बाधा के रूप में देखने लगते हैं। उनकी शुरुआती कृतज्ञता अब गुस्से और झुंझलाहट में बदल जाती है।
वे सब मिलकर उस पर दबाव डालना शुरू करते हैं। कॉर्नुडेट परिवार, कैर्रे-लमाडॉन परिवार और काउंट व काउंटेस डी ब्रिविल सभी उसे "देशभक्ति" और "नैतिकता" के नाम पर अधिकारी के साथ सोने के लिए राजी करने की कोशिश करते हैं। वे तर्क देते हैं कि उसकी "बलिदान" से उन सबकी जान बच जाएगी और वे अपने गंतव्य तक पहुँच पाएँगे। नन भी, हालांकि सीधे तौर पर नहीं, बूले दे सुइफ को "ईश्वर की इच्छा" और "बलिदान" के बारे में अप्रत्यक्ष रूप से समझाने की कोशिश करती हैं। वे उसे एक धार्मिक ऐतिहासिक आकृति, जुडिथ के बारे में कहानी सुनाते हैं, जिसने अपने लोगों को बचाने के लिए एक दुश्मन कमांडर को मोह लिया था। वे उसके पेशे का भी इस्तेमाल करते हुए तर्क देते हैं कि यह उसके लिए कोई नई बात नहीं होगी। इस दबाव के कारण बूले दे सुइफ बहुत मानसिक पीड़ा में आ जाती है। वह अपने देश और यात्रियों के प्रति वफादारी और अपनी व्यक्तिगत गरिमा और घृणा के बीच फँस जाती है।
अनुभाग 5: बूले दे सुइफ का आत्म-बलिदान और यात्रा की बहाली
दो दिन तक चले निरंतर दबाव, सामाजिक बहिष्करण और तर्क-वितर्क के बाद, बूले दे सुइफ अंततः हार मान लेती है। वह अपनी मर्जी के खिलाफ प्रशियाई अधिकारी के कमरे में जाती है और उसके साथ रात बिताती है। इस 'बलिदान' के बाद, अगली सुबह, अधिकारी स्टेजकोच को आगे जाने की अनुमति दे देता है।
यात्री तुरंत बूले दे सुइफ के साथ अपने व्यवहार में बदलाव लाते हैं। अब वे उसे एक बार फिर नीच और तुच्छ समझने लगते हैं। उन्होंने अपने उद्देश्य के लिए उसका इस्तेमाल किया है, और अब उन्हें उसकी ज़रूरत नहीं है, तो वे उसे फिर से अपनी मूल सामाजिक स्थिति में धकेल देते हैं।
अनुभाग 6: यात्रा की निरंतरता और बूले दे सुइफ का अकेलापन
स्टेजकोच अपनी यात्रा जारी रखता है। यात्री राहत महसूस करते हैं और सामान्य तरीके से व्यवहार करने लगते हैं। वे सब एक-दूसरे से बातें करते हैं, चुटकुले सुनाते हैं और अपने भोजन के बारे में चर्चा करते हैं। हालांकि, इस बार किसी ने भी अपने भोजन को बूले दे सुइफ के साथ साझा करने की पेशकश नहीं की है। वे उसे पूरी तरह से अलग-थलग कर देते हैं, उसे एक ऐसे अछूत की तरह मानते हैं जिसने उन्हें अपमानित किया है।
बूले दे सुइफ, अपनी मानसिक पीड़ा और अपमान के कारण, यात्रा के दौरान कुछ भी खाने में असमर्थ रहती है। उसे भूख लगी है, लेकिन किसी ने उसे कुछ नहीं दिया। वह अपनी सीटों के बीच बैठकर चुपचाप रोती रहती है, जिसे किसी की सहानुभूति नहीं मिलती। बाकी यात्री उसकी तरफ से मुंह फेर लेते हैं और अपनी बातचीत में लगे रहते हैं, जैसे कि वह मौजूद ही न हो। कहानी का अंत बूले दे सुइफ की गहरी उदासी और उसके साथ हुए अन्याय को उजागर करता है, जबकि अन्य यात्री अपनी जीत का जश्न मनाते हुए और अपनी सामाजिक शिष्टता का प्रदर्शन करते हुए दिखाई देते हैं।
शैली: लघु कथा (Short Story), यथार्थवाद (Realism), प्रकृतिवाद (Naturalism), सामाजिक व्यंग्य (Social Satire)।
लेखक के बारे में:
गाइ दे मोपासाँ (1850-1893) एक फ्रांसीसी लेखक थे जिन्हें फ्रांसीसी साहित्य में यथार्थवाद और प्रकृतिवाद के प्रमुख प्रतिपादकों में से एक माना जाता है। वह अपनी सैकड़ों लघु कथाओं के लिए सबसे प्रसिद्ध हैं, जिनमें से 'बूले दे सुइफ' उनकी पहली बड़ी सफलता थी। उनके लेखन में अक्सर फ्रेंको-प्रशिया युद्ध की पृष्ठभूमि, मानव स्वभाव के काले पक्ष, सामाजिक पाखंड, वर्ग संघर्ष और ग्रामीण जीवन का चित्रण मिलता है। मोपासाँ को उनके स्पष्ट और संक्षिप्त गद्य के लिए सराहा जाता है। वह प्रसिद्ध लेखक गुस्ताव फ्लेबर्ट के शिष्य थे।
नैतिकता:
'बूले दे सुइफ' की मुख्य नैतिकता सामाजिक पाखंड और स्वार्थ की निंदा है। यह दर्शाती है कि कैसे समाज के "सम्मानित" सदस्य, अपनी सुविधा के लिए, उन लोगों का उपयोग करते हैं जिन्हें वे नीच मानते हैं, और एक बार जब उनका काम निकल जाता है, तो उन्हें फिर से तिरस्कृत कर देते हैं। यह कहानी सच्चे देशभक्ति और बलिदान के महत्व पर सवाल उठाती है और दिखाती है कि कैसे वर्ग भेद और सामाजिक पूर्वाग्रह मानव गरिमा को कुचल सकते हैं।
जिज्ञासु तथ्य:
- 'बूले दे सुइफ' गाइ दे मोपासाँ की पहली प्रकाशित कृति थी और इसने उन्हें तुरंत प्रसिद्धि दिलाई।
- यह कहानी मोपासाँ के गुरु, गुस्ताव फ्लेबर्ट द्वारा अत्यधिक सराही गई थी, जिन्होंने इसे एक उत्कृष्ट कृति कहा था।
- माना जाता है कि कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है, जो फ्रेंको-प्रशिया युद्ध के दौरान हुई थी।
- यह कहानी यथार्थवाद और प्रकृतिवाद साहित्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो मानव प्रकृति को बिना किसी कृत्रिमता के उसके यथार्थ रूप में प्रस्तुत करती है।
- मोपासाँ ने इस कहानी को केवल तीन दिनों में लिखा था।
