chhah paatr ek lekhak ki talaash mein - luigi pirandello

सारांश

लुइगी पिरान्देल्लो का नाटक 'सिक्स कैरेक्टर्स इन सर्च ऑफ़ एन ऑथर' (छह पात्र एक लेखक की तलाश में) एक मेटा-थिएट्रिकल नाटक है जो वास्तविकता और भ्रम, कला और जीवन की प्रकृति की पड़ताल करता है। कहानी एक थिएटर में शुरू होती है जहाँ एक निर्देशक और उसकी मंडली पिरान्देल्लो के ही एक नाटक का पूर्वाभ्यास कर रहे होते हैं। अचानक, छह पात्र (एक पिता, एक माँ, एक सौतेली बेटी, एक बेटा, और दो छोटे बच्चे - एक लड़का और एक लड़की) मंच पर प्रकट होते हैं। वे दावा करते हैं कि वे एक अधूरे नाटक के पात्र हैं और उनके लेखक ने उन्हें छोड़ दिया है, जिससे वे अपनी कहानी कहने और अपने दुख को पूरा करने के लिए एक मंच और एक निर्देशक की तलाश में हैं।

निर्देशक पहले तो उन्हें भ्रमित और गुस्सा करने वाला मानता है, लेकिन धीरे-धीरे उनके मार्मिक और जटिल पारिवारिक नाटक में दिलचस्पी लेने लगता है। पात्र अपनी दुखद कहानी बताते हैं: पिता ने माँ को अपने सचिव के साथ रहने के लिए प्रोत्साहित किया था, जिससे माँ के तीन बच्चे (सौतेली बेटी और दो छोटे बच्चे) हुए। बाद में, पिता अनजाने में सौतेली बेटी के साथ एक वेश्यालय में मिलता है, जहाँ सौतेली बेटी अपनी माँ और बच्चों को गुजारा करने के लिए काम करती है। यह लगभग अनाचार का क्षण पात्रों के स्थायी आघात का केंद्र बिंदु है।

जैसे ही निर्देशक और अभिनेता उनकी कहानी को मंच पर दोहराने की कोशिश करते हैं, पात्र अपने स्वयं के "सत्य" के लिए लड़ते हैं, यह तर्क देते हुए कि अभिनेता उनकी वास्तविकता को कभी भी पूरी तरह से नहीं समझ सकते या चित्रित नहीं कर सकते। नाटक पात्रों और अभिनेताओं के बीच बढ़ते तनाव, पहचान की प्रकृति पर दार्शनिक बहस और नाटकीय प्रतिनिधित्व की सीमाओं के साथ समाप्त होता है, जो एक दुखद और अस्पष्ट निष्कर्ष पर पहुंचता है जहाँ जीवन और कला के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।

किताब के अनुभाग

अनुभाग 1: पूर्वाभ्यास और पात्रों का आगमन

यह अनुभाग एक नाटक कंपनी के पूर्वाभ्यास के दौरान एक थिएटर में खुलता है। निर्देशक और अभिनेता लुइगी पिरान्देल्लो द्वारा निर्देशित एक नाटक 'प्लेइंग ईच हिज़ पार्ट' का पूर्वाभ्यास कर रहे हैं। निर्देशक अपनी मंडली को समझाता है कि नाटक कैसे करना है, और अभिनेता अपनी पंक्तियों और भावनाओं के साथ संघर्ष कर रहे हैं। मंच पर भ्रम और अव्यवस्था का माहौल है। अचानक, छह रहस्यमय व्यक्ति मंच पर प्रवेश करते हैं। वे सभी काले रंग के कपड़े पहने हुए हैं और उनके चेहरे दुखी और मार्मिक हैं। निर्देशक उन्हें घुसपैठिए मानकर भगाना चाहता है, लेकिन वे दृढ़ता से कहते हैं कि वे नाटक के पात्र हैं, जिन्हें उनके लेखक ने अधूरा छोड़ दिया है। वे अपनी अधूरी कहानी को पूरा करने के लिए एक निर्देशक और एक मंच की तलाश में हैं। वे नाटक की दुनिया में जीवन की वास्तविकता को लाने के लिए आए हैं।

पात्र विशेषताएँ प्रेरणाएँ
निर्देशक व्यावहारिक, अधीर, कलात्मक अखंडता को बनाए रखने का प्रयास करता है, एक सफल नाटक बनाने के लिए उत्सुक, शुरू में संदेहवादी लेकिन धीरे-धीरे पात्रों की कहानी में दिलचस्पी लेता है। एक सफल नाटक का मंचन करना, अपनी रचनात्मकता को व्यक्त करना, मंच पर आदेश बनाए रखना, अंततः पात्रों की अद्वितीय कहानी को समझने और मंचित करने का प्रयास करना।
पिता मौखिक, दार्शनिक, बौद्धिक, आत्म-औचित्यकारी, जटिल और नैतिक रूप से संदिग्ध अतीत वाला व्यक्ति, अपनी क्रियाओं को समझाना चाहता है। अपनी कहानी को न्यायसंगत ठहराना, दूसरों को अपनी स्थिति को समझना, अपनी स्थायी पीड़ा और पहचान को व्यक्त करना, अपने पापों से मुक्ति पाना।
माँ दुःख में डूबी हुई, निष्क्रिय, चुपचाप पीड़ित, भावनात्मक रूप से संवेदनशील, अपनी बेटियों के प्रति बहुत सुरक्षात्मक। अपने दुःख को व्यक्त करना, अपने बच्चों की रक्षा करना, अपने कष्टों को पहचाना जाना, विशेष रूप से अपने बच्चों की दुर्दशा के लिए।
सौतेली बेटी उग्र, भावुक, विद्रोही, पितृसत्तात्मक समाज और पिता के कार्यों की कटु आलोचना करती है, बदला लेने की इच्छा रखती है। अपने और अपनी माँ के प्रति किए गए अन्याय को उजागर करना, पिता को अपमानित करना, अपने दर्द और यौन शोषण की कहानी बताना, बदला लेना।
बेटा अलग-थलग, असभ्य, अपने परिवार से शर्मिंदा, उनका नाटक और भावनात्मक प्रदर्शन उसे असहज करता है। अपने परिवार से दूर रहना, उनकी त्रासदी से अलग रहना, अपनी पहचान बनाए रखना जो उनकी परिवारिक शर्म से अप्रभावित हो।
छोटा बेटा शांत, मासूम, उदासीन, अपने परिवार की त्रासदी का एक मौन शिकार। केवल कहानी के दुःखी अंत में अपनी भूमिका निभाता है; उसका दुःख उसकी मासूमियत में निहित है।
छोटी बेटी शांत, मासूम, भयभीत, अपने परिवार की त्रासदी का एक और मौन शिकार। केवल कहानी के दुःखी अंत में अपनी भूमिका निभाती है; उसका दुःख उसकी मासूमियत में निहित है।
मुख्य अभिनेता निर्देशक के निर्देशों का पालन करने वाला, अपनी भूमिका को गंभीरता से लेने वाला, लेकिन पात्रों की वास्तविक भावनाओं को समझने में कठिनाई महसूस करता है। अपनी कला को ईमानदारी से निभाना, पात्रों की कहानियों को सटीक रूप से चित्रित करने की कोशिश करना, लेकिन अपनी नाटकीय सीमाओं से बाधित होता है।
मुख्य अभिनेत्री मुख्य अभिनेता के समान, अपनी कला में कुशल लेकिन वास्तविक जीवन की पीड़ा के सामने असहाय। अपनी कला को ईमानदारी से निभाना, पात्रों की कहानियों को सटीक रूप से चित्रित करने की कोशिश करना, लेकिन अपनी नाटकीय सीमाओं से बाधित होता है।

अनुभाग 2: पात्रों की कहानी का अनावरण

निर्देशक पात्रों के दावों से मोहित हो जाता है और उनसे अपनी कहानी बताने के लिए कहता है। पिता, अपनी दार्शनिक प्रवृत्ति के साथ, कहानी को अपनी दृष्टि से समझाने की कोशिश करता है, यह तर्क देता है कि वह "विचारों का पात्र" है। वह बताता है कि कैसे उसने अपनी पत्नी (माँ) को अपने सचिव के साथ भाग जाने के लिए "उत्साहित" किया, यह विश्वास करते हुए कि यह उसके लिए बेहतर होगा। माँ ने सचिव के साथ तीन बच्चे पैदा किए - सौतेली बेटी, छोटा बेटा और छोटी बेटी। पिता अपनी भावनात्मक और बौद्धिक स्वतंत्रता के लिए इस व्यवस्था को सही ठहराता है, लेकिन माँ चुपचाप अपने दुःख और अलगाव से पीड़ित है। सौतेली बेटी गुस्से में और कटुता से पिता पर हमला करती है, उसे पाखंडी कहती है और अपनी माँ के दुःख के लिए उसे दोषी ठहराती है। बेटा, जो पिता और माँ की पहली शादी से है, अपने सौतेले भाई-बहनों और उनकी कहानी से दूर रहता है, वह अपनी परिवारिक शर्म से अलग रहना चाहता है।

पात्र निर्देशक से अपनी कहानी को मंच पर दोहराने का आग्रह करते हैं। निर्देशक और अभिनेता इस अनूठी स्थिति से जूझते हैं। अभिनेता पात्रों की भावनाओं को व्यक्त करने की कोशिश करते हैं, लेकिन पात्रों को लगता है कि अभिनेता उनकी वास्तविकता को विकृत कर रहे हैं, उनकी भावनाओं को अपर्याप्त रूप से व्यक्त कर रहे हैं। सौतेली बेटी विशेष रूप से असंतुष्ट है, यह तर्क देती है कि कोई भी उसके अपमानजनक अतीत को वास्तव में नहीं समझ सकता है।

अनुभाग 3: मैडम पेस और अपमान का पल

पात्रों की कहानी जारी रहती है। माँ के पति (सचिव) की मृत्यु के बाद, परिवार गरीबी में गिर जाता है। सौतेली बेटी को मैडम पेस नामक एक वेश्यालय संचालिका के यहाँ काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। पिता अपनी पुरानी आदतों में वापस आ जाता है और मैडम पेस के वेश्यालय में जाना शुरू कर देता है, अनजाने में अपनी सौतेली बेटी से मिलने के लिए। यह एक अत्यंत नाटकीय क्षण है जहाँ पिता लगभग अनाचार करता है, यह जाने बिना कि वह उसकी सौतेली बेटी है। माँ अचानक वेश्यालय में प्रवेश करती है और इस भयावह दृश्य को देखती है, जिससे सभी को सदमा लगता है। यह घटना पात्रों के जीवन में एक स्थायी आघात बन जाती है, जो उनके बीच स्थायी कड़वाहट और अपराधबोध पैदा करती है।

जब निर्देशक चाहता है कि अभिनेता इस दृश्य का मंचन करें, तो सौतेली बेटी और पिता आपत्ति करते हैं, यह कहते हुए कि अभिनेता उनकी असली पीड़ा और शर्म को कभी नहीं समझ सकते। सौतेली बेटी मैडम पेस को बुलाती है, और मैडम पेस, जो कहानी का हिस्सा है, मंच पर प्रकट होती है। वह स्पेनिश/इतालवी में बोलती है और उस भयानक क्षण को दोहराती है, जिससे पात्रों की वास्तविकता और अभिनेताओं की कृत्रिमता के बीच तनाव बढ़ जाता है। निर्देशक पात्रों को उनकी कहानी कहने के लिए प्रोत्साहित करता है, लेकिन अभिनेता उनकी तीव्र भावनाओं और नाटकीयता से अभिभूत हो जाते हैं।

अनुभाग 4: त्रासदी का समापन

कहानी का अंत दुखद रूप से होता है। छोटा बेटा, अपनी बहन (छोटी बेटी) के साथ एक शांत और परित्यक्त अवस्था में, बगीचे में भटकता है। छोटी बेटी, जिसे अनदेखा किया जाता है और डराया जाता है, अंततः बगीचे में एक फव्वारे में डूब जाती है। छोटे बेटे को यह देखकर सदमा लगता है और वह खुद को गोली मार लेता है। माँ की चीखें और सौतेली बेटी का गुस्सा वातावरण को भर देता है। पिता और बेटा एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं, जबकि निर्देशक और अभिनेता इस भयानक और वास्तविक त्रासदी से स्तब्ध रह जाते हैं।

इस बिंदु पर, जीवन और कला, वास्तविकता और भ्रम के बीच की रेखा पूरी तरह से धुंधली हो जाती है। अभिनेता अब और अभिनय नहीं कर सकते क्योंकि पात्रों की पीड़ा इतनी वास्तविक और तीव्र है। निर्देशक यह तय नहीं कर पाता कि यह एक वास्तविक त्रासदी थी या पात्रों का एक और नाटकीय प्रदर्शन। नाटक एक अस्पष्ट निष्कर्ष पर समाप्त होता है, यह सवाल छोड़ता है कि क्या हमने एक नाटक देखा या जीवन की एक दुखद झलक। पात्र, अपनी स्थायी पहचान के साथ, अपनी पीड़ा को जीर्ण-शीर्ण करते रहते हैं, यह दिखाते हुए कि कला कभी भी जीवन की पूरी सच्चाई को नहीं पकड़ सकती।

साहित्यिक शैली: नाटक (नाटक के भीतर नाटक, मेटा-थिएटर), विडंबनापूर्ण, दार्शनिक।

लेखक के कुछ तथ्य:

  • लुइगी पिरान्देल्लो (1867-1936) एक इतालवी नाटककार, उपन्यासकार और लघु कथाकार थे।
  • उन्हें 1934 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।
  • उनके काम अक्सर पहचान, वास्तविकता और भ्रम, और व्यक्तिपरक सत्य के विषयों का पता लगाते हैं।
  • वह 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली नाटककारों में से एक थे और उन्हें आधुनिकतावादी नाटक और मेटा-थिएटर के अग्रदूत के रूप में जाना जाता है।

नैतिकता:
नाटक की कोई स्पष्ट, सरल नैतिकता नहीं है, बल्कि यह वास्तविकता की प्रकृति और स्वयं की पहचान के बारे में गहन प्रश्न उठाता है। यह सुझाव देता है कि "सत्य" व्यक्तिपरक है और अक्सर भ्रमित करने वाला होता है, और यह कि मनुष्य अपने ही दृष्टिकोण और अनुभवों द्वारा निर्मित "पहचान" में फंस जाते हैं। कला, हालांकि यह जीवन को प्रतिबिंबित करने का प्रयास करती है, कभी भी इसकी जटिलता और पीड़ा को पूरी तरह से पकड़ नहीं सकती है। हर व्यक्ति अपने स्वयं के "नाटक" का पात्र होता है, और कोई भी दूसरे की वास्तविकता को पूरी तरह से समझ या उसका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है।

उत्सुकताएँ:

  • मेटा-थिएटर: यह नाटक "एक नाटक के भीतर एक नाटक" का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ नाटक की कार्रवाई थिएटर और कला की प्रकृति पर टिप्पणी करती है।
  • चौथी दीवार तोड़ना: पात्र सीधे दर्शकों और अभिनेताओं से बात करते हैं, जो पारंपरिक नाटकीय सम्मेलनों को तोड़ता है।
  • पहचान का तरलता: पिरान्देल्लो का विचार कि मनुष्य की पहचान स्थिर नहीं होती है, बल्कि दूसरों की धारणाओं और अनुभवों से लगातार बदलती रहती है। छह पात्र इस विचार को मूर्त रूप देते हैं कि एक बार जब आप एक निश्चित पहचान बन जाते हैं (जैसे कि एक पात्र), तो आप उस पहचान से कभी नहीं बच सकते।
  • प्रतिक्रिया: जब यह पहली बार 1921 में मंचित हुआ, तो रोम में दर्शकों ने गुस्से में प्रतिक्रिया व्यक्त की, "पागलखाना!" चिल्लाया। हालांकि, मिलान में इसका पुनरुद्धार एक बड़ी सफलता थी और इसे 20वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण नाटकों में से एक के रूप में मान्यता मिली।