ek - luigi pirandello

सारांश

लुइगी पिरानदेल्लो की 'एक, कोई नहीं और एक लाख' (Uno, Nessuno e Centomila) वितेंगेलो मोस्कार्डा की कहानी है, जो एक अमीर और आलसी व्यक्ति है, जिसकी दुनिया तब बिखर जाती है जब उसकी पत्नी उसे बताती है कि उसकी नाक थोड़ी टेढ़ी है। यह मामूली अवलोकन उसे इस बात का एहसास कराता है कि वह दूसरों की नज़र में खुद को कैसे देखता है, उससे बिल्कुल अलग है। वह पाता है कि दूसरों के दिमाग में उसके कई "वितेंगेलो" मौजूद हैं, जिनमें से कोई भी उसके अपने आंतरिक अनुभव से मेल नहीं खाता। यह अहसास उसे एक अस्तित्वगत संकट की ओर ले जाता है, जहाँ वह उन सभी "वितेंगेलो" को नष्ट करने की कोशिश करता है जो दूसरों ने उसके लिए बनाए हैं, एक "वास्तविक" स्वयं की तलाश करता है, या शायद यह महसूस करता है कि कोई निश्चित स्वयं नहीं है। वह अपनी पत्नी से अलग हो जाता है, अपनी सारी संपत्ति दान कर देता है, उसे पागल घोषित कर दिया जाता है, और अंततः एक सांप्रदायिक आश्रम में शांति पाता है, जहाँ वह सभी निश्चित पहचान का त्याग करता है और जीवन के निरंतर प्रवाह को गले लगाता है।

किताब के अनुभाग

अनुभाग 1

वितेंगेलो मोस्कार्डा अपनी पत्नी दीदा के साथ अपनी आरामदायक और नियमित जिंदगी जी रहा है, जब एक दिन, एक तुच्छ टिप्पणी सब कुछ बदल देती है। दीदा उसे बताती है कि उसकी नाक थोड़ी टेढ़ी है, और वह हमेशा बाईं ओर झुकी रहती है। यह टिप्पणी वितेंगेलो के आत्म-अवलोकन को उत्तेजित करती है। वह खुद को आईने में देखता है और एक ऐसी खामी को नोटिस करता है जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा था। यह उसे इस विचार पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है कि दूसरों को वह कैसा दिखता है, और वह खुद को कैसा देखता है। वह इस अहसास से आतंकित हो जाता है कि दुनिया में उसके सैकड़ों अलग-अलग संस्करण मौजूद हैं, हर किसी की अपनी धारणा और व्याख्या है। उसके लिए "वितेंगेलो" वह एक स्थिर व्यक्ति है, लेकिन दूसरों के लिए, वह "एक लाख" अलग-अलग "वितेंगेलो" है। यह विरोधाभास उसे अपने स्वयं की प्रकृति पर जुनूनी रूप से सवाल उठाना शुरू कर देता है।

पात्र विशेषताएँ प्रेरणाएँ
वितेंगेलो मोस्कार्डा अमीर, आलसी, आत्म-अवशोषित, दार्शनिक। अपने स्वयं के बारे में सच्चाई खोजने की इच्छा, दूसरों की धारणाओं को समझना।
दीदा सीधी-सादी, व्यावहारिक, पति की पत्नी। अपने पति को मामूली अवलोकन करके चिढ़ाना, या बस एक तथ्य बताना।

अनुभाग 2

वितेंगेलो इस विचार से जूझ रहा है कि दूसरों की आँखों में उसकी पहचान उससे कितनी अलग है जो वह खुद के बारे में सोचता है। वह अपने बैंक के व्यवसाय में अपनी भूमिका पर सवाल उठाना शुरू कर देता है, जिसे उसके पिता ने स्थापित किया था। वह अपने कर्मचारियों, विशेष रूप से प्रबंधक क्वारंटा, और सूदखोर सेबास्तियानो से बात करता है, यह समझने की कोशिश करता है कि वे उसे कैसे देखते हैं। वह उन छवियों को नष्ट करने का दृढ़ संकल्प करता है जो दूसरों ने उसके लिए बनाई हैं। यह लक्ष्य उसे जानबूझकर ऐसे तरीके से कार्य करने के लिए प्रेरित करता है जो उनके लिए अपरिचित है, अपने स्वयं के बारे में उनकी निश्चित धारणाओं को बाधित करने के लिए। वह अपनी शारीरिक दिखावट, अपनी आदतें और अपने तरीके बदलने की कोशिश करता है। उसका व्यवहार अधिक से अधिक अप्रत्याशित हो जाता है, जिससे उसके आस-पास के लोग भ्रमित और चिंतित हो जाते हैं।

अनुभाग 3

वितेंगेलो अपने पिता की विरासत द्वारा बनाई गई पहचान को चुनौती देने पर केंद्रित है, खासकर सूदखोर सेबास्तियानो के साथ उनके संबंधों के माध्यम से। उसके पिता ने सूदखोरी के माध्यम से अपना भाग्य बनाया था, और वितेंगेलो को "सूदखोर के बेटे" के रूप में देखा जाता है। वह इस पहचान को मिटाने की कोशिश करता है। वह गरीबों को पैसा देकर अपने पिता के सूदखोरी के कृत्यों का प्रायश्चित करने की कोशिश करता है, जिससे लोग और भ्रमित और क्रोधित होते हैं, और उसकी "पागलपन" में उनके विश्वास की पुष्टि होती है। वह जानबूझकर लोगों की उम्मीदों के खिलाफ कार्य करना शुरू कर देता है ताकि उनके "वितेंगेलो" को नष्ट किया जा सके। वह अपने आस-पास के लोगों को परेशान करता है, जिससे उनकी स्थिर धारणाएं टूट जाती हैं।

पात्र विशेषताएँ प्रेरणाएँ
क्वारंटा बैंक प्रबंधक, वफादार, पारंपरिक, सतर्क। बैंक के व्यवसाय और वितेंगेलो के पिता की विरासत को बनाए रखना, अपने मालिक के बदलती आदतों से निपटना।
सेबास्तियानो सूदखोर, वितेंगेलो के पिता का पूर्व सहयोगी, चालाक। अपना व्यवसाय बनाए रखना, वितेंगेलो की बदलती आदतों से भ्रमित और चिंतित होना।

अनुभाग 4

वितेंगेलो का अजीब और विघटनकारी व्यवहार उसके और उसकी पत्नी दीदा के बीच एक बड़ी दरार पैदा करता है। दीदा उसके अस्तित्वगत संकट को समझने में असमर्थ है और उसे मानसिक रूप से अस्थिर मानती है। वह अपने पति के बढ़ते अलगाव और उसके हर कार्य पर उसके दर्शन के निरंतर विश्लेषण से परेशान है। वह उससे दूर होती जाती है, क्योंकि वह उस आदमी को पहचान नहीं पाती जिससे उसने शादी की थी। वितेंगेलो भी जानबूझकर खुद को उससे दूर करता है, यह मानते हुए कि दीदा की नज़र में उसका "वितेंगेलो" भी एक और झूठी पहचान है जिसे नष्ट किया जाना चाहिए। अंततः, दीदा उसे छोड़ देती है, अपने पति के इस नए, रहस्यमय और विघटित व्यक्तित्व के साथ रहने में असमर्थ होकर।

अनुभाग 5

वितेंगेलो अन्ना रोजा के साथ दोस्ती विकसित करता है, जो दीदा की तुलना में अधिक बौद्धिक और सहानुभूतिपूर्ण चरित्र है। वह उसे अपने दार्शनिक संघर्षों के बारे में बताता है, और वह उसकी बात सुनती है और कुछ हद तक उसकी खोज को समझती है। वह उसे खुद को पहचानने की उसकी आवश्यकता के बारे में बताता है, जो दूसरों की धारणाओं से दूषित नहीं है। एक बिंदु पर, वे वास्तविकता और धारणा पर बहस कर रहे होते हैं। एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है जब वितेंगेलो, दुर्घटनावश या प्रतीकवाद के माध्यम से, अन्ना रोजा को गोली मार देता है। यह घटना उसकी बढ़ती मानसिक अस्थिरता और वास्तविकता से उसके अलगाव को दर्शाती है।

पात्र विशेषताएँ प्रेरणाएँ
अन्ना रोजा बुद्धिमान, संवेदनशील, दार्शनिक, वितेंगेलो की दोस्त। वितेंगेलो को समझना, उसके अस्तित्व संबंधी संकट में उसका समर्थन करना।

अनुभाग 6

अन्ना रोजा की शूटिंग की घटना उसकी "पागलपन" की सार्वजनिक धारणा को पुष्ट करती है। कानूनी कार्यवाही शुरू हो जाती है, और वितेंगेलो खुद को एक आपराधिक जांच के केंद्र में पाता है। हालांकि, उसके कार्य की प्रेरणा इतनी जटिल और दार्शनिक है कि अदालत और समाज उसे समझ नहीं पाते। वह अपराधबोध या पश्चाताप महसूस नहीं करता है, क्योंकि उसका कार्य उसके बड़े अस्तित्वगत संघर्ष का हिस्सा था। वह अपनी कानूनी दुर्दशा से भी अलग हो जाता है, क्योंकि उसे अब किसी भी निश्चित पहचान, यहां तक कि एक अपराधी की पहचान की भी परवाह नहीं है। वह अब "कोई नहीं" बनने के विचार को गले लगाना शुरू कर देता है, सभी विशिष्ट पहचानों को त्याग देता है।

अनुभाग 7

घोटाले और आगे की कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए, वितेंगेलो को मॉनसिनोर परटाना जैसे चर्च के अधिकारियों द्वारा अपनी शेष संपत्ति एक धर्मार्थ आश्रम बनाने के लिए दान करने के लिए राजी किया जाता है। यह आश्रम गरीबों और असहायों की देखभाल करेगा। यह व्यवस्था वितेंगेलो को अपनी वित्तीय और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने की अनुमति देती है। एक विडंबनापूर्ण मोड़ में, वितेंगेलो स्वयं इस नव-स्थापित आश्रम में रहने के लिए आता है, एक अज्ञात निवासी के रूप में, एक कैदी के रूप में नहीं। वह अपना नाम, अपनी पिछली जिंदगी और अपनी सभी पहचानों को पीछे छोड़ देता है।

पात्र विशेषताएँ प्रेरणाएँ
मॉनसिग्नोर परटाना चर्च का अधिकारी, सम्मानित, व्यावहारिक, शांतिदूत। घोटाले से बचना, वितेंगेलो की संपत्ति का उपयोग धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए करना, चर्च की छवि बनाए रखना।

अनुभाग 8

वितेंगेलो अपने नए अस्तित्व को गले लगाता है। वह आश्रम में एक गुमनाम व्यक्ति के रूप में रहता है, बिना किसी निश्चित नाम या पहचान के। वह खुद को प्रकृति के निरंतर प्रवाह और जीवन के नवीकरण में घुलता हुआ पाता है। वह खुद को विशेष रूप से कुछ भी नहीं देखता है, बल्कि सब कुछ का हिस्सा है - एक पेड़, एक बादल, एक पत्थर। वह एक एकल, स्थिर स्वयं की अवधारणा का त्याग करता है, यह महसूस करते हुए कि ऐसी कोई चीज मौजूद नहीं है। वह निरंतर परिवर्तन की स्थिति में शांति पाता है, "कोई नहीं" बनकर "एक लाख" संभावनाओं के बीच, लगातार बदलता रहता है और अपने चारों ओर जीवन के साथ घुलमिल जाता है। वह अंततः इस समझ में मुक्ति पाता है कि पहचान एक तरल पदार्थ और क्षणिक निर्माण है, न कि एक निश्चित इकाई।


साहित्यिक विधा: दार्शनिक उपन्यास, आधुनिकतावादी साहित्य, मनोवैज्ञानिक उपन्यास।

लेखक के बारे में:
लुइगी पिरानदेल्लो (1867-1936) एक इतालवी नाटककार, उपन्यासकार और लघुकथाकार थे। उन्हें 1934 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वह अपनी गहन दार्शनिक अंतर्दृष्टि के लिए जाने जाते हैं, खासकर भ्रम बनाम वास्तविकता, पहचान की तरलता और स्वयं की बहुलता के विषयों की उनकी खोज के लिए। उनके कार्य अक्सर पाठकों को मानव अस्तित्व और धारणा की प्रकृति पर सवाल उठाने के लिए चुनौती देते हैं।

कहानी का नैतिक:
'एक, कोई नहीं और एक लाख' का मूल नैतिक पहचान की मायावी प्रकृति और एक एकल, निश्चित स्वयं की असंभवता के इर्द-गिर्द घूमता है। यह इस बात पर जोर देता है कि दूसरों की धारणाएं हमें कैसे आकार देती हैं और स्वयं की आवश्यकता को छोड़ने और निरंतर परिवर्तन को गले लगाने में मुक्ति पाई जा सकती है। यह सिखाता है कि "मैं" कोई स्थिर इकाई नहीं है, बल्कि एक क्षणभंगुर और बहुआयामी निर्माण है, जो बाहरी दुनिया द्वारा लगातार बदलता रहता है और प्रभावित होता रहता है।

किताब के बारे में रोचक तथ्य:

  • पिरानदेल्लो ने इस उपन्यास पर लगभग पंद्रह वर्षों तक काम किया, जो 1909 में शुरू हुआ और 1926 में समाप्त हुआ। यह उनकी सबसे जटिल और दार्शनिक कृतियों में से एक माना जाता है, जो उनके विचारों के शिखर का प्रतिनिधित्व करता है।
  • पुस्तक का शीर्षक - एक, कोई नहीं और एक लाख - स्वयं एक विरोधाभास है जो केंद्रीय विषय को पूरी तरह से समाहित करता है: स्वयं की एकता का भ्रम ("एक"), पहचान का पूर्ण विनाश ("कोई नहीं"), और स्वयं की अनगिनत छवियां जो दूसरों के दिमाग में मौजूद हैं ("एक लाख")।
  • उपन्यास पारंपरिक कथा संरचनाओं को चुनौती देता है, क्योंकि यह बड़े पैमाने पर वितेंगेलो मोस्कार्डा के आंतरिक एकालाप के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो पाठक को उसके अस्तित्वगत संकट और दार्शनिक विचारों में गहराई से डुबो देता है।
  • यह पिरानदेल्लो के सिनेमाई प्रभावों के साथ प्रयोग का भी एक उदाहरण है, जिसमें वितेंगेलो की अपनी धारणा की खोज एक आंतरिक कैमरा लेंस के माध्यम से होने का सुझाव देती है।