flaubert parivar ki murkhata - jyan pol sartr

सारांश

जीन-पॉल सार्त्र की 'फ्लाबेर्ट: ला इडियोटे डी ला फैमिली' (फ्लाबेर्ट: परिवार का बेवकूफ) गुस्ताव फ्लाबेर्ट के जीवन और कार्य का एक विशाल और गहन मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन है। यह पुस्तक फ्लाबेर्ट के बचपन से लेकर 1857 में उनके उपन्यास 'मैडम बोवरी' के प्रकाशन तक के उनके जीवनकाल को कवर करती है। सार्त्र ने "अस्तित्ववादी मनोविश्लेषण" नामक अपनी अनूठी विधि का उपयोग किया है, जिसमें मार्क्सवाद, मनोविश्लेषण और अस्तित्ववाद को मिलाकर यह समझाने की कोशिश की गई है कि कैसे फ्लाबेर्ट अपने परिवेश और प्रारंभिक अनुभवों के भीतर रहते हुए, एक अद्वितीय कलाकार के रूप में विकसित हुए।

सार्त्र का मुख्य तर्क यह है कि फ्लाबेर्ट, अपने बचपन के न्यूरोसिस और लगभग 22 साल की उम्र में हुए एक गंभीर संकट (जिसे सार्त्र ने मिर्गी के दौरे या हिस्टीरिकल अटैक के रूप में व्याख्या किया) से पीड़ित होकर, एक कलाकार बनने का चुनाव करते हैं। यह चुनाव उनके परिवार के भीतर उनकी कथित "मूर्खता" या निष्क्रियता से बचने और उसे पार करने का एक तरीका था। सार्त्र बताते हैं कि फ्लाबेर्ट का रूढ़िवादी और व्यावहारिक परिवार, विशेष रूप से उनके डॉक्टर पिता, उनके "मूल चुनाव" (original choice) को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह पुस्तक केवल एक जीवनी नहीं है, बल्कि यह समझने का एक प्रयास है कि व्यक्ति अपनी दी गई परिस्थितियों की बाधाओं के भीतर खुद को कैसे बनाता है।

किताब के अनुभाग

अनुभाग 1: प्रारंभिक जीवन और "परिवार का बेवकूफ"

इस अनुभाग में सार्त्र फ्लाबेर्ट के जन्म, प्रारंभिक बचपन और फ्लाबेर्ट परिवार में उनकी स्थिति की पड़ताल करते हैं। सार्त्र का तर्क है कि गुस्ताव फ्लाबेर्ट बचपन में अपने सफल और व्यावहारिक पिता, डॉक्टर अचिल-क्लॉड फ्लाबेर्ट, और अपनी बुद्धिमान बड़ी बहन कैरोलिन की तुलना में खुद को धीमा, कल्पनाशील और "बेवकूफ" महसूस करते थे। उनका परिवार वैज्ञानिक, तर्कसंगत और भौतिक उपलब्धियों को महत्व देता था, और गुस्ताव की सपनों की दुनिया और संवेदनशीलता को पूरी तरह से नहीं समझा जाता था या उसे कम आंका जाता था। इस शुरुआती अनुभव ने उनके "मूल चुनाव" (original choice) को आकार दिया, जिससे वह अपनी कल्पना की दुनिया में पीछे हट गए और खुद को एक 'बाहरी' के रूप में देखना शुरू कर दिया। यह स्थिति उन्हें एक ऐसे अस्तित्व की ओर धकेलती है जहाँ वह अपनी पहचान बाहरी दुनिया के नियमों के बजाय अपनी आंतरिक दुनिया के माध्यम से बनाते हैं।

नाम विशेषताएँ प्रेरणाएँ
गुस्ताव फ्लाबेर्ट बचपन में धीमा, कल्पनाशील, संवेदनशील, बहिर्मुखी नहीं अपने परिवार में अस्वीकृति या कमज़ोरी की भावना से बचना, अपनी कल्पना में शरण लेना।
अचिल फ्लाबेर्ट गुस्ताव का बड़ा भाई, पिता की तरह डॉक्टर परिवार की परंपराओं का पालन करना, व्यवहारिक और सफल होना।
कैरोलिन फ्लाबेर्ट गुस्ताव की बहन, बुद्धिमान, परिवार में स्वीकृत परिवार की अपेक्षाओं पर खरा उतरना, गुस्ताव से ज़्यादा सफल और स्वीकृत होना।
डॉ. अचिल-क्लॉड फ्लाबेर्ट गुस्ताव के पिता, प्रसिद्ध सर्जन, तर्कवादी, व्यवहारिक बच्चों को सफल और व्यवहारिक बनाना, वैज्ञानिक और तर्कसंगत मूल्यों को महत्व देना।
मैडम फ्लाबेर्ट गुस्ताव की माँ, शांत, अक्सर अपने पति के अधीन परिवार में शांति बनाए रखना, गुस्ताव की कल्पनाशीलता को कुछ हद तक समझना, लेकिन पति की इच्छाओं का पालन करना।

अनुभाग 2: संकट और पलायन

लगभग 1843-1844 के दौरान फ्लाबेर्ट को एक गंभीर संकट का अनुभव हुआ, जिसमें उन्हें शारीरिक दौरे पड़े। सार्त्र इन दौरों को मिर्गी के बजाय हिस्टीरिकल फिट्स या मनोदैहिक बीमारी के रूप में व्याख्या करते हैं। सार्त्र के अनुसार, यह संकट फ्लाबेर्ट के लिए एक "पलायन" था। वह कानून की पढ़ाई को नापसंद करते थे और सामाजिक अपेक्षाओं के दबाव से बचना चाहते थे। यह बीमारी उन्हें "अक्षम" की भूमिका अपनाने की अनुमति देती है, जिससे उन्हें लेखन के अपने जुनून को पूरा करने के लिए स्वतंत्रता मिली। यह एक सचेत या अचेत "चुनाव" था जिसने कला के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को मजबूत किया और उन्हें अपनी शर्तों पर जीने का अवसर दिया। इस समय, उन्होंने अपने परिवार और समाज की मांगों से खुद को अलग कर लिया और कला को ही अपना एकमात्र मार्ग बना लिया।

अनुभाग 3: कलाकार का चुनाव और कल्पना का साम्राज्य

इस अनुभाग में सार्त्र विस्तार से बताते हैं कि कैसे फ्लाबेर्ट ने जानबूझकर (या अचेत रूप से) कलाकार के मार्ग को चुना। उन्होंने बुर्जुआ मूल्यों और व्यावहारिक दुनिया को अस्वीकार कर दिया। सार्त्र तर्क देते हैं कि फ्लाबेर्ट की कला के प्रति गहन समर्पण, "मोत जुस्ते" (सही शब्द) की तलाश, और कला की अवैयक्तिक प्रकृति उनकी अस्तित्ववादी परियोजना का हिस्सा थे। फ्लाबेर्ट का मानना था कि कला मोक्ष का एक रूप है और यह अस्तित्व की आकस्मिकता से बचने का एक तरीका है। सार्त्र इस कलात्मक परियोजना की "न्यूरोटिक" संरचना पर जोर देते हैं - कला केवल एक पसंद नहीं थी, बल्कि एक आवश्यकता थी, जो उन्हें अपनी शुरुआती अक्षमताओं और परिवार में अपनी स्थिति को पार करने में मदद करती थी। उन्होंने अपनी कल्पना में एक साम्राज्य बनाया, जहाँ वह अपनी शर्तों पर शासन कर सकते थे।

अनुभाग 4: मिस्र की यात्रा और यथार्थवाद का विकास

इस अनुभाग में फ्लाबेर्ट की यात्राओं, विशेष रूप से मिस्र की उनकी यात्रा का विश्लेषण किया गया है, और यह कैसे उनके विश्वदृष्टि और कलात्मक विकास को प्रभावित करता है। सार्त्र बताते हैं कि फ्लाबेर्ट ने यथार्थवादी सौंदर्यशास्त्र के साथ रोमांटिक आदर्शवाद के बीच संघर्ष किया। यात्राओं ने उन्हें दुनिया को एक बाहरी और तटस्थ पर्यवेक्षक के रूप में देखने में मदद की, जिससे कला में "अवैयक्तिकता" के उनके विचार को बल मिला। यह अवधि 'मैडम बोवरी' के लेखन से पहले की थी, और फ्लाबेर्ट ने "बुर्जुआ" और सामान्यता के प्रति अपनी घृणा को परिष्कृत किया जिसे उन्होंने अपने परिवेश में देखा। उन्होंने महसूस किया कि दुनिया में हर जगह एक प्रकार की मूर्खता और तुच्छता व्याप्त है, जिसे वह अपनी कला के माध्यम से उजागर करना चाहते थे।

अनुभाग 5: मैडम बोवरी और "अंतिम विजय"

अंतिम अनुभाग में 'मैडम बोवरी' के लेखन और प्रकाशन पर ध्यान केंद्रित किया गया है। सार्त्र इस उपन्यास को फ्लाबेर्ट के "मूल चुनाव" और उनकी अस्तित्ववादी परियोजना की पराकाष्ठा मानते हैं। 'मैडम बोवरी' एक ऐसा उपन्यास है जो वास्तविकता की सामान्यता से रोमांटिक भ्रम की हार को दर्शाता है, जो फ्लाबेर्ट के अपने शुरुआती संघर्षों को प्रतिबिंबित करता है। सार्त्र तर्क देते हैं कि फ्लाबेर्ट ने अपने अंदर महसूस की गई "मूर्खता" को अपनी नायिका एम्मा बोवरी सहित अपने पात्रों में बाहरीकृत और खोजा। यह उपन्यास उनकी व्यक्तिगत राक्षसों और सामाजिक दबावों पर फ्लाबेर्ट की कलात्मक इच्छाशक्ति की जीत का प्रतीक है। इसके माध्यम से, फ्लाबेर्ट ने न केवल एक महान कृति का निर्माण किया, बल्कि खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में भी स्थापित किया जिसने अपनी नियति को अपनी शर्तों पर गढ़ा।


साहित्यिक विधा: अस्तित्ववादी जीवनी, दार्शनिक अध्ययन, साहित्यिक आलोचना, मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन।

लेखक के बारे में:
जीन-पॉल सार्त्र (1905-1980) एक फ्रांसीसी दार्शनिक, नाटककार, उपन्यासकार, राजनीतिक कार्यकर्ता और साहित्यिक आलोचक थे। वह अस्तित्ववाद (Existentialism) के प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे और उन्होंने феноमेनोलॉजी (Phenomenology) में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्हें 1964 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था, जिसे उन्होंने "एक लेखक को खुद को एक संस्था में बदलने की अनुमति नहीं देनी चाहिए" कहते हुए अस्वीकार कर दिया था। उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ 'बीइंग एंड नथिंगनेस' (Being and Nothingness), 'नॉज़िया' (Nausea) और 'नो एग्ज़िट' (No Exit) हैं।

नैतिकता (संदेश):
यह पुस्तक इस बात पर ज़ोर देती है कि मनुष्य केवल अपने परिवेश और अपने अतीत का परिणाम नहीं होता, बल्कि वह अपनी पसंद से अपने अस्तित्व को परिभाषित करता है ("अस्तित्व सार से पहले आता है")। यह सिखाता है कि विकट और प्रतिबंधात्मक परिस्थितियों में भी, व्यक्ति के पास हमेशा अपना मार्ग चुनने और भविष्य में खुद को ढालने की आज़ादी होती है। सार्त्र का काम यह भी दर्शाता है कि मनोविकार (neurosis) कभी-कभी एक रचनात्मक अनुकूलन हो सकता है, दुनिया में जीवित रहने और खुद को मुखर करने का एक तरीका। कुल मिलाकर, यह मानवीय इच्छाशक्ति की शक्ति का प्रमाण है जो कथित कमज़ोरियों को ताक़त में बदल सकती है, या कम से कम एक अद्वितीय और प्रामाणिक पहचान बना सकती है।

जिज्ञासाएँ:

  • यह पुस्तक अधूरी है; सार्त्र ने मूल रूप से छह खंडों की योजना बनाई थी, लेकिन केवल चार प्रकाशित हुए (पांचवां खंड मरणोपरांत प्रकाशित हुआ)। यह फ्लाबेर्ट के जीवन को केवल 1857 में 'मैडम बोवरी' के प्रकाशन तक ही कवर करती है।
  • यह अब तक लिखी गई सबसे लंबी जीवनी संबंधी रचनाओं में से एक है, जो फ्रेंच संस्करण में 2,800 से अधिक पृष्ठों की है।
  • सार्त्र ने इस पुस्तक पर दस साल से अधिक समय (1957 से 1971 तक) काम किया, और इसे अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य मानते थे। उन्होंने इसे अपने "जीवन के काम का निष्कर्ष" कहा था।
  • यह एक विवादास्पद कृति है, जिसे इसकी बौद्धिक महत्वाकांक्षा के लिए व्यापक रूप से सराहा गया है, लेकिन कुछ जीवनीकारों द्वारा इसकी सट्टा मनोविश्लेषण, अत्यधिक लंबाई और विशिष्ट तथ्यों की कमी के लिए आलोचना भी की गई है।