ghumakkad - saimual johnson

सारांश

सैमुअल जॉनसन की "द रैम्बलर" 208 निबंधों की एक श्रृंखला है जो 20 मार्च 1750 से 14 मार्च 1752 तक सप्ताह में दो बार प्रकाशित हुई थी। यह एक सतत कहानी या उपन्यास नहीं है, बल्कि मानव स्वभाव, नैतिकता, साहित्य और समाज के विभिन्न पहलुओं पर जॉनसन के गहन चिंतन और विचारों का संग्रह है। इन निबंधों में जॉनसन ने अपने छद्म नाम "द रैम्बलर" के तहत मानव जीवन की जटिलताओं, कमजोरियों, गुणों और सामाजिक रीति-रिवाजों का विश्लेषण किया है। उनका उद्देश्य पाठकों को ज्ञान प्रदान करना, उनके नैतिक आचरण में सुधार करना और उन्हें जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करना था। वह अक्सर काल्पनिक पात्रों, पत्रों और दृष्टांतों का उपयोग करते थे ताकि अपने तर्कों को स्पष्ट कर सकें और अपने पाठकों को नैतिक और दार्शनिक सच्चाइयों से अवगत करा सकें।

किताब के अनुभाग

अनुभाग 1: द रैम्बलर का परिचय (निबंध संख्या 1)

इस पहले निबंध में, सैमुअल जॉनसन अपने पाठक से परिचित होते हैं और "द रैम्बलर" के नाम के तहत अपने लेखन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने यह नाम इसलिए चुना क्योंकि उनका इरादा ज्ञान के हर क्षेत्र में भटकना और विभिन्न विषयों पर चिंतन करना है। वह स्वीकार करते हैं कि एक लेखक के रूप में उनका काम चुनौतीपूर्ण है, खासकर जब उन्हें लगातार कुछ नया और शिक्षाप्रद प्रस्तुत करना होता है। वह अपने पाठकों से सहिष्णुता और विचारशीलता की अपील करते हैं, यह मानते हुए कि मनुष्य की अपूर्णता के कारण कुछ कमियाँ हो सकती हैं। वह अपने निबंधों के माध्यम से सत्य, नैतिकता और ज्ञान की खोज करने की अपनी प्रतिबद्धता को व्यक्त करते हैं, जिसका लक्ष्य केवल मनोरंजन के बजाय सुधार और मार्गदर्शन करना है।

पात्र विशेषताएँ प्रेरणाएँ
द रैम्बलर (सैमुअल जॉनसन का छद्म नाम) चिंतनशील, नैतिक, विद्वान, गंभीर, आत्म-विश्लेषी, सुधारवादी पाठकों को नैतिक और बौद्धिक रूप से शिक्षित करना; मानव स्वभाव और समाज की सच्चाइयों का पता लगाना; त्रुटियों को सुधारना और ज्ञान प्रदान करना।

अनुभाग 2: आलस्य के खतरे (निबंध संख्या 29)

इस निबंध में जॉनसन आलस्य के विनाशकारी स्वभाव की पड़ताल करते हैं। वह तर्क देते हैं कि आलस्य सिर्फ समय की बर्बादी नहीं है, बल्कि यह मन को भी भ्रष्ट करता है और व्यक्ति को किसी भी उपयोगी प्रयास से रोकता है। वह बताते हैं कि जो लोग आलसी होते हैं वे अक्सर निष्क्रियता की स्थिति में रहते हैं, अपने जीवन को बिना किसी उद्देश्य या उपलब्धि के व्यतीत करते हैं। जॉनसन आलस्य को एक ऐसी बीमारी के रूप में चित्रित करते हैं जो धीरे-धीरे व्यक्ति की क्षमताओं को कम करती है और उसे असंतोष और पश्चाताप की स्थिति में छोड़ देती है। वह इस बात पर जोर देते हैं कि वास्तविक सुख और संतोष उत्पादक गतिविधियों और उद्देश्यपूर्ण जीवन से आता है। वह पाठकों को आलस्य से बचने और अपने समय का सदुपयोग करने के लिए प्रेरित करते हैं, ताकि वे एक सार्थक और सफल जीवन जी सकें।

अनुभाग 3: काल्पनिक विपत्ति पर (निबंध संख्या 120)

इस निबंध में जॉनसन त्रासदी और पाठक पर उसके प्रभाव पर विचार करते हैं। वह उन काल्पनिक दुखों की पड़ताल करते हैं जिन्हें हम साहित्य या नाटक में देखते हैं और उन पर हमारी प्रतिक्रिया। जॉनसन तर्क देते हैं कि हालांकि काल्पनिक कहानियाँ भावनाओं को जगा सकती हैं, फिर भी एक निश्चित सीमा तक ही हम उन पर प्रतिक्रिया देते हैं। वह कहते हैं कि पाठक या दर्शक की सहानुभूति तब तक ही रहती है जब तक उन्हें यह विश्वास होता है कि प्रस्तुत किया गया दुख यथार्थवादी और प्रासंगिक है। वह यह भी बताते हैं कि बहुत अधिक दुख या अविश्वसनीय घटनाओं से पाठक की सहानुभूति कम हो सकती है, क्योंकि वे इसे वास्तविक जीवन से अलग कर देते हैं। जॉनसन अंततः इस विचार को प्रस्तुत करते हैं कि साहित्य का उद्देश्य सिर्फ भावनाओं को भड़काना नहीं है, बल्कि नैतिक शिक्षा प्रदान करना और मानव अनुभव की समझ को गहरा करना है, भले ही उसमें काल्पनिक दुख शामिल हो।

अनुभाग 4: पति के चुनाव पर एक युवा महिला का पत्र (निबंध संख्या 188)

यह निबंध एक काल्पनिक युवा महिला द्वारा "द रैम्बलर" को लिखे गए पत्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पत्र में, महिला अपनी शादी के लिए एक पति चुनने में आने वाली दुविधाओं और चुनौतियों का वर्णन करती है। वह समाज की अपेक्षाओं, विभिन्न प्रकार के पुरुषों और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के बीच फंसी हुई है। वह एक ऐसा पति चाहती है जो न केवल सामाजिक रूप से स्वीकार्य हो बल्कि उसके साथ सच्चा सुख और संगतता भी प्रदान कर सके। वह धनी लेकिन मूर्ख पुरुषों, बुद्धिमान लेकिन गरीब पुरुषों, या ऐसे पुरुषों के बीच चयन करने की कठिनाई पर प्रकाश डालती है जिनके पास कोई स्पष्ट गुण या दोष नहीं है। यह निबंध विवाह, सामाजिक दबाव और जीवन साथी के चुनाव में विवेक के महत्व पर एक सूक्ष्म टिप्पणी है। यह उस समय की युवा महिलाओं के सामने आने वाली वास्तविक दुविधाओं को दर्शाता है।

पात्र विशेषताएँ प्रेरणाएँ
युवा महिला (पत्र लेखक) अनिर्णायक, चिंतनशील, सामाजिक रूप से जागरूक, व्यावहारिकता और भावनात्मक संतुष्टि के बीच संतुलन तलाशने वाली एक उपयुक्त पति का चुनाव करना जो सामाजिक सुरक्षा और व्यक्तिगत खुशी दोनों प्रदान करे; अपनी भविष्य की भलाई सुनिश्चित करना।

साहित्यिक शैली

"द रैम्बलर" एक नैतिक निबंध संग्रह है। इसे नवशास्त्रीय गद्य और नैतिक दर्शन की श्रेणी में रखा जा सकता है। यह विचारों पर आधारित साहित्य है, न कि कथा साहित्य।

लेखक के बारे में कुछ तथ्य

  • नाम: सैमुअल जॉनसन (Samuel Johnson)
  • जन्म: 18 सितंबर 1709, लिचफ़ील्ड, स्टैफ़ोर्डशायर, इंग्लैंड में।
  • मृत्यु: 13 दिसंबर 1784, लंदन, इंग्लैंड में।
  • पेशा: अंग्रेजी लेखक, कवि, निबंधकार, नैतिकवादी, साहित्यिक आलोचक, जीवनी लेखक और लेक्सिकोग्राफर (शब्दकोश-निर्माता)।
  • प्रमुख कार्य: 'अ डिक्शनरी ऑफ़ द इंग्लिश लैंग्वेज' (1755) उनका सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली कार्य है। 'लाइव्स ऑफ़ द मोस्ट एमिनेंट इंग्लिश पोएट्स' भी उनकी एक महत्वपूर्ण रचना है।
  • शैली: वह अपनी गहन अंतर्दृष्टि, नैतिक गंभीरता और सटीक गद्य शैली के लिए जाने जाते थे।
  • उपाधि: उन्हें अक्सर "डॉक्टर जॉनसन" के रूप में संदर्भित किया जाता है, हालांकि उन्होंने कभी डॉक्टरेट की उपाधि हासिल नहीं की थी, यह सम्मान उनके साहित्यिक योगदान के कारण उन्हें दिया गया था।

नैतिक शिक्षा

"द रैम्बलर" की केंद्रीय नैतिक शिक्षा यह है कि मानव जीवन में नैतिक आचरण, आत्म-चिंतन और ज्ञान की खोज अत्यंत महत्वपूर्ण है। जॉनसन निरंतर पाठकों को अपनी कमजोरियों का सामना करने, गुणों को विकसित करने और एक उद्देश्यपूर्ण व सार्थक जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। वह सिखाते हैं कि सच्चा सुख और संतोष बाहरी परिस्थितियों के बजाय आंतरिक नैतिक मूल्यों और विवेकपूर्ण निर्णयों से आता है। वह यह भी दर्शाते हैं कि मानवीय अनुभव, चाहे वह सुखद हो या दुखद, गहन विचार और नैतिक सुधार का स्रोत बन सकता है।

कुछ रोचक बातें

  • प्रकाशन की कठिनाई: जॉनसन ने ये निबंध उस समय लिखे थे जब वह एक लेखक के रूप में वित्तीय और व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना कर रहे थे। 'द रैम्बलर' को लगातार प्रकाशित करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी।
  • एकल लेखक: 'द रैम्बलर' के 208 निबंधों में से केवल पाँच निबंध ही जॉनसन के अलावा किसी और ने लिखे थे (दो उनकी दोस्त एलिजाबेथ कार्टर ने और तीन अन्य ने)। अधिकांश काम पूरी तरह से जॉनसन का था।
  • शुरुआती प्रतिक्रिया: जॉनसन के जीवनकाल के दौरान, 'द रैम्बलर' को आम जनता की तुलना में अधिक साहित्यिक आलोचकों और विद्वानों द्वारा सराहा गया। हालांकि, यह उनके नैतिक अधिकार और साहित्यिक प्रतिष्ठा को स्थापित करने में महत्वपूर्ण था।
  • प्रभाव: इन निबंधों ने बाद के लेखकों और नैतिक दार्शनिकों पर गहरा प्रभाव डाला। जॉनसन के विचार और उनकी गद्य शैली अंग्रेजी साहित्य में एक महत्वपूर्ण मानक बन गए।
  • जॉनसन की व्यक्तिगत छाप: निबंधों में जॉनसन की अपनी व्यक्तिगत संघर्षों, निराशाओं और ज्ञान की खोज की गहरी छाप दिखाई देती है, जो उन्हें समय के साथ और अधिक मूल्यवान बनाती है। वह अक्सर अपने स्वयं के अनुभवों से प्राप्त ज्ञान को साझा करते थे।