कला क्या है? - लिओ टॉल्स्टॉय
सारांश
लियो टॉल्स्टॉय की पुस्तक 'कला क्या है?' कला की प्रकृति और उद्देश्य पर एक गहन दार्शनिक निबंध है। इसमें टॉल्स्टॉय कला की प्रचलित परिभाषाओं (जो सौंदर्य या आनंद पर आधारित हैं) को अस्वीकार करते हैं और अपनी स्वयं की परिभाषा प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार, कला विचारों या भावनाओं का संचार नहीं है, बल्कि एक ऐसी मानवीय गतिविधि है जिसमें एक व्यक्ति अपनी उस भावना को जानबूझकर दूसरों तक पहुँचाता है जिसका उसने अनुभव किया है, और दूसरे लोग इस भावना से संक्रमित होते हैं और उसी का अनुभव करते हैं। वे समकालीन पश्चिमी कला (विशेषकर उनके समय की) को नकली और अधःपतन से ग्रस्त मानते हैं, क्योंकि यह केवल उच्च वर्ग के लिए सुख और मनोरंजन प्रदान करती है, और सार्वभौमिक धार्मिक भावना या सामान्य मानवीय भावनाओं को व्यक्त करने में विफल रहती है। टॉल्स्टॉय सच्ची कला को उस कला के रूप में देखते हैं जो सभी लोगों को एक साथ जोड़ती है, सहानुभूति पैदा करती है और आध्यात्मिक और नैतिक उत्थान का कारण बनती है। वह कला के उस रूप की वकालत करते हैं जो धार्मिक चेतना और भ्रातृत्व के आदर्शों को बढ़ावा देता है।
किताब के अनुभाग
अनुभाग 1: कला की प्रचलित परिभाषाओं का खंडन
इस अनुभाग में, टॉल्स्टॉय कला की विभिन्न मौजूदा परिभाषाओं की जाँच करते हैं, जिनमें से अधिकांश सौंदर्य पर आधारित हैं। वे इन परिभाषाओं को अपर्याप्त और आत्म-विरोधाभासी पाते हैं। वे तर्क देते हैं कि "सौंदर्य" की अवधारणा व्यक्तिपरक है और इसका उपयोग कला को न्यायोचित ठहराने के लिए किया जाता है जो केवल कुछ लोगों को ही प्रसन्न करती है। वे कला के उद्देश्य के रूप में आनंद या मनोरंजन को भी खारिज करते हैं, यह कहते हुए कि यदि कला का उद्देश्य केवल आनंद देना है, तो फिर इसमें और किसी भी अन्य सुखद गतिविधि में कोई अंतर नहीं रह जाएगा। टॉल्स्टॉय का मानना है कि इन परिभाषाओं ने कला को उसकी सच्ची, सार्वभौमिक भूमिका से दूर कर दिया है और इसे एक ऐसे दायरे तक सीमित कर दिया है जो केवल धनी और विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों की सेवा करता है। वे कला पर खर्च होने वाले विशाल संसाधनों और श्रम की भी निंदा करते हैं, यह सवाल करते हुए कि क्या यह सब सार्थक है यदि कला केवल एक संकीर्ण दर्शक वर्ग को आनंद देती है।
| पात्र/आकृति | विशेषताएँ | प्रेरणाएँ |
|---|---|---|
| लियो टॉल्स्टॉय | गंभीर, दार्शनिक, नैतिकवादी, समाज सुधारक। कला की सच्ची प्रकृति और उद्देश्य को समझना चाहते हैं। | कला को उसकी सतही और वर्ग-आधारित उपयोगिता से मुक्त करना, इसे एक सार्वभौमिक नैतिक शक्ति के रूप में पुनर्स्थापित करना। समाज के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए कला की भूमिका को स्पष्ट करना। |
अनुभाग 2: टॉल्स्टॉय की कला की परिभाषा
इस खंड में, टॉल्स्टॉय अपनी कला की परिभाषा प्रस्तुत करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि कला केवल कौशल या सौंदर्य रचना नहीं है, बल्कि एक मानवीय गतिविधि है। उनकी परिभाषा के अनुसार, कला तब होती है जब कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी भावना का अनुभव करता है और उसे रेखाओं, रंगों, शब्दों या ध्वनियों के माध्यम से दूसरों तक पहुँचाता है, ताकि दूसरों को भी वही भावना महसूस हो। यह संक्रामक गुण ही कला का सार है। वे कहते हैं कि कला का पैमाना यह नहीं है कि वह कितनी सुंदर है या कितनी सुखद है, बल्कि यह है कि वह कितनी संक्रामक है - यानी, दर्शक या श्रोता कितनी दृढ़ता से कलाकार की भावना से जुड़ते हैं और उसे महसूस करते हैं। जितनी अधिक ईमानदारी से और स्पष्ट रूप से भावना को व्यक्त किया जाता है, उतनी ही अधिक सफल कला मानी जाती है।
अनुभाग 3: सच्ची कला और नकली कला में अंतर
टॉल्स्टॉय सच्ची कला और जिसे वे "नकली कला" (counterfeit art) कहते हैं, उसके बीच अंतर करते हैं। वे मानते हैं कि उनके समय की अधिकांश कला नकली है क्योंकि इसमें संक्रामकता की कमी है और यह ईमानदारी से भावना को व्यक्त नहीं करती है। वे नकली कला के तीन मुख्य लक्षणों की पहचान करते हैं:
- अनुकरण (Borrowing): अन्य कलाकृतियों से विषयों या शैलियों की नकल करना।
- सजावट (Imitation): बाहरी प्रभाव पैदा करने के लिए विवरणों को जोड़ना।
- मनोरंजन (Effectiveness): दर्शकों को किसी विशेष प्रभाव से चकित करने का प्रयास करना।
वे तर्क देते हैं कि ये सभी तरीके सच्ची भावना के अभाव को छिपाने के लिए उपयोग किए जाते हैं, और परिणामी कार्य सतही और सारहीन होता है। सच्ची कला हमेशा अद्वितीय होती है क्योंकि यह कलाकार की व्यक्तिगत और वास्तविक भावना का संचार करती है।
अनुभाग 4: आधुनिक कला का खंडन
टॉल्स्टॉय आधुनिक (उनके समय की) कला की कड़ी आलोचना करते हैं, जिसमें पुनर्जागरण से लेकर उनके समकालीन प्रभाववादी, प्रतीकवादी और भविष्यवादी आंदोलनों तक शामिल हैं। वे इन कला रूपों को संभ्रांतवादी, अस्पष्ट और सार्वभौमिक रूप से पहुंच योग्य नहीं मानते हैं। वे तर्क देते हैं कि चूंकि ये कलाकृतियाँ केवल उच्च वर्गों की समझ और स्वाद के अनुरूप बनाई गई हैं, इसलिए वे आम लोगों के लिए निरर्थक हैं और उन्हें कोई नैतिक या आध्यात्मिक लाभ नहीं देती हैं। वे विशेष रूप से कला में कामुकता, जटिलता और बौद्धिक खेल के बढ़ते उपयोग की निंदा करते हैं, यह कहते हुए कि ये सभी कला को उसकी सच्ची मानवीय भूमिका से दूर ले जाते हैं। वे बीथोवेन के संगीत, शेक्सपियर के नाटकों और पुनर्जागरण के कई चित्रकारों के कार्यों को भी अस्वीकार करते हैं क्योंकि वे उन्हें सार्वभौमिक भावनाओं को संप्रेषित करने में विफल पाते हैं या उन्हें नैतिक रूप से संदिग्ध मानते हैं।
अनुभाग 5: सच्ची कला की शर्तें और भविष्य
टॉल्स्टॉय के अनुसार, सच्ची कला को दो शर्तों को पूरा करना चाहिए:
- सार्वभौमिकता (Universality): यह सभी लोगों के लिए सुलभ होनी चाहिए, न कि केवल एक विशेष वर्ग के लिए।
- धार्मिक चेतना (Religious perception): यह अपने समय की धार्मिक भावना को व्यक्त करनी चाहिए, जो टॉल्स्टॉय के लिए प्रेम और भ्रातृत्व के ईसाई आदर्शों से जुड़ी थी।
वे मानते हैं कि कला का उद्देश्य मनुष्य को ईश्वर और एक-दूसरे के करीब लाना है। उनका मानना है कि भविष्य की कला धार्मिक चेतना पर आधारित होगी, जो सभी मनुष्यों को एकजुट करेगी और उनके भ्रातृत्व की भावना को मजबूत करेगी। ऐसी कला ही सच्ची, महान और सार्थक होगी। यह न तो महंगी होगी, न विशेष रूप से प्रशिक्षित लोगों द्वारा बनाई जाएगी, बल्कि सभी लोगों द्वारा सहजता से समझी जाएगी और अनुभव की जाएगी।
साहित्यिक शैली
निबंध, दार्शनिक ग्रंथ, सौंदर्यशास्त्र पर आलोचनात्मक कार्य।
लेखक के बारे में
लियो टॉल्स्टॉय (1828-1910) एक रूसी लेखक थे जिन्हें अब तक के महानतम लेखकों में से एक माना जाता है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'युद्ध और शांति' (War and Peace) और 'अन्ना कैरेनिना' (Anna Karenina) विश्व साहित्य में मील के पत्थर हैं। वे एक गहरे नैतिक और आध्यात्मिक विचारक भी थे, जिन्होंने अपने बाद के जीवन में सरल जीवन, अहिंसा और ईसाई अराजकतावाद के विचारों को अपनाया। 'कला क्या है?' उनके दार्शनिक और नैतिक विचारों का एक महत्वपूर्ण प्रकटीकरण है, जहाँ उन्होंने समाज, धर्म और कला के संबंधों पर अपने तीव्र विचारों को प्रस्तुत किया।
नैतिक शिक्षा
पुस्तक की मुख्य नैतिक शिक्षा यह है कि सच्ची कला का उद्देश्य मनुष्य को एकजुट करना और आध्यात्मिक उत्थान करना है, न कि केवल सुख या मनोरंजन प्रदान करना। कला को सार्वभौमिक भ्रातृत्व और प्रेम की भावना को बढ़ावा देना चाहिए। यदि कला इन मूल्यों से भटक जाती है, तो वह अपने सच्चे उद्देश्य से भटक जाती है और नैतिक रूप से खोखली हो जाती है।
जिज्ञासु तथ्य
- टॉल्स्टॉय ने इस पुस्तक को लिखने में लगभग 15 वर्ष लगाए, और इस दौरान उन्होंने कला के बारे में अपने विचारों पर गहन चिंतन किया।
- पुस्तक में टॉल्स्टॉय ने अपने ही कुछ प्रसिद्ध कार्यों (जैसे 'युद्ध और शांति' और 'अन्ना कैरेनिना') को भी "नकली कला" के रूप में खारिज कर दिया था, क्योंकि उन्हें लगा कि वे उच्च वर्ग के लिए लिखे गए थे और सार्वभौमिक धार्मिक भावना को व्यक्त नहीं करते थे।
- इस पुस्तक ने कला जगत में भारी विवाद खड़ा कर दिया, क्योंकि इसमें कई प्रतिष्ठित कलाकारों और उनके कार्यों की कड़ी आलोचना की गई थी, जिनमें शेक्सपियर, बीथोवेन, राफेल और मिशेलएंजेलो जैसे नाम शामिल थे।
- टॉल्स्टॉय का मानना था कि भविष्य की सच्ची कला इतनी सरल और सीधी होगी कि कोई भी किसान भी इसे समझ सकेगा और इससे प्रभावित हो सकेगा।
