nagrik shakti ka dharmik mamlon mein granth - jaun miltan

सारांश

जॉन मिल्टन का 'अ ट्रीटाइज़ ऑफ़ सिविल पावर इन इक्लेसिऐस्टिकल कॉज़ेज़' एक राजनीतिक और धार्मिक ग्रंथ है जो इस तर्क को प्रस्तुत करता है कि नागरिक अधिकारियों को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। मिल्टन का तर्क है कि प्रत्येक व्यक्ति का विवेक केवल ईश्वर के प्रति उत्तरदायी है, और कोई भी बाहरी शक्ति, चाहे वह राज्य हो या चर्च, किसी व्यक्ति की धार्मिक मान्यताओं या पूजा-पद्धति को मजबूर नहीं कर सकती। वह इस बात पर जोर देते हैं कि नागरिक सरकार का कार्य केवल नागरिक शांति और व्यवस्था बनाए रखना है, न कि व्यक्तियों के धार्मिक विश्वासों को विनियमित करना। मिल्टन मानते हैं कि धार्मिक जबरदस्ती न केवल अप्रभावी है (यह वास्तविक विश्वास को नहीं बदल सकती) बल्कि अधार्मिक भी है (यह ईश्वर के अधिकार का अतिक्रमण करती है)। वह प्रोटेस्टेंट सुधार के सिद्धांतों पर आधारित धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता के लिए एक मजबूत दलील देते हैं।

किताब के अनुभाग

अनुभाग 1: विवेक की प्रकृति और इसकी अलगावनीयता

मिल्टन इस ग्रंथ की शुरुआत विवेक की पवित्र प्रकृति पर अपने तर्क को स्थापित करते हुए करते हैं। वह तर्क देते हैं कि विवेक एक व्यक्तिगत और आंतरिक क्षेत्र है जो सीधे ईश्वर के साथ संबंधित है। यह किसी भी नागरिक या धार्मिक अधिकार से ऊपर है और केवल ईश्वर के वचन और व्यक्तिगत व्याख्या के माध्यम से ही निर्देशित हो सकता है। किसी भी बाहरी शक्ति द्वारा विवेक पर दबाव डालना न केवल व्यर्थ है, बल्कि ईशनिंदा भी है, क्योंकि यह ईश्वर के क्षेत्र में अतिक्रमण करता है।