द टेन्योर ऑफ़ किंग्स एंड मैजिस्ट्रेट्स - जॉन मिल्टन
सारांश जॉन मिल्टन की पुस्तक 'द टेन्योर ऑफ़ किंग्स एंड मजिस्ट्रेट्स' (The Tenure of Kings and Magistrates) 1649 में प्रकाशित एक राजनीतिक पुस...
सारांश
जॉन मिल्टन की पुस्तक 'द टेन्योर ऑफ़ किंग्स एंड मजिस्ट्रेट्स' (The Tenure of Kings and Magistrates) 1649 में प्रकाशित एक राजनीतिक पुस्तिका है। यह इंग्लैंड के राजा चार्ल्स प्रथम को फाँसी दिए जाने के तुरंत बाद लिखी गई थी, और इसका उद्देश्य राजशाही को समाप्त करने और राष्ट्रमंडल की स्थापना के कार्यों को न्यायोचित ठहराना था। मिल्टन का केंद्रीय तर्क यह है कि सभी राजनीतिक शक्ति मूल रूप से जनता से निकलती है। राजा और मजिस्ट्रेट जनता द्वारा चुने गए सेवक होते हैं, जिन्हें कुछ शर्तों के तहत शासन करने का अधिकार दिया जाता है। यदि कोई शासक इन शर्तों का उल्लंघन करता है, अत्याचारी बन जाता है, या जनता के अधिकारों का हनन करता है, तो जनता को उसे पद से हटाने, उसे जवाबदेह ठहराने, और यहाँ तक कि उसे फाँसी देने का भी अधिकार है। मिल्टन बाइबिल, इतिहास और प्राकृतिक कानून के उदाहरणों का उपयोग करके अपने इस तर्क का समर्थन करते हैं, और यह दिखाते हैं कि राजशाही कोई दैवीय अधिकार नहीं है, बल्कि एक नागरिक समझौता है जिसे उल्लंघन करने पर रद्द किया जा सकता है।
किताब के अनुभाग
अनुभाग 1: प्रस्तावना और मूल तर्क
यह अनुभाग मिल्टन के मुख्य तर्क की नींव रखता है। वह इस बात पर जोर देते हैं कि मनुष्य मूल रूप से स्वतंत्र पैदा हुए थे, लेकिन आपसी सुरक्षा और कल्याण के लिए उन्होंने स्वेच्छा से एक समाज का निर्माण किया। इस प्रक्रिया में, उन्होंने अपनी कुछ स्वतंत्रताएं शासकों (राजाओं और मजिस्ट्रेटों) को सौंप दीं, ताकि वे न्याय और व्यवस्था बनाए रख सकें। मिल्टन के अनुसार, राजा या मजिस्ट्रेट केवल प्रतिनिधि या सेवक होते हैं, जिनके पास शक्ति जनता से आती है, न कि किसी दैवीय अधिकार से। उनका पद एक सशर्त समझौता है, और यदि वे अपनी शपथ तोड़ते हैं या अत्याचारी बन जाते हैं, तो जनता को उन्हें पद से हटाने का अधिकार है।
| किरदार/समूह | विशेषताएँ | प्रेरणाएँ |
|---|---|---|
| जनता (The People) | राजनीतिक शक्ति का मूल स्रोत, विवेकशील, स्वतंत्रता-प्रेमी। | शांति, व्यवस्था, न्याय और स्वतंत्रता को बनाए रखना। अत्याचार से मुक्ति पाना। |
| राजा/मजिस्ट्रेट (Kings/Magistrates) | जनता द्वारा चुने गए सेवक, कानून के रखवाले। | जनता की भलाई के लिए शासन करना, न्याय दिलाना, कानूनों को लागू करना। (लेकिन अक्सर व्यक्तिगत शक्ति और स्वार्थ से प्रेरित हो जाते हैं)। |
अनुभाग 2: अत्याचारी राजा का अधिकार
इस अनुभाग में, मिल्टन उन तर्कों का खंडन करते हैं जो यह दावा करते हैं कि राजाओं को ईश्वर द्वारा नियुक्त किया जाता है और इसलिए वे जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होते। वह तर्क देते हैं कि बाइबिल भी यह नहीं सिखाती कि किसी अत्याचारी राजा के प्रति अंधभक्ति रखनी चाहिए। बल्कि, बाइबिल में ऐसे उदाहरण हैं जहाँ लोगों ने अत्याचारी शासकों का विरोध किया और उन्हें दंडित किया। मिल्टन उन पादरियों और विद्वानों की भी आलोचना करते हैं जो इस गलत धारणा को बढ़ावा देते हैं कि राजाओं के पास असीमित शक्ति है। उनके अनुसार, यदि कोई राजा अत्याचारी बन जाता है, तो वह अपने पद का नैतिक अधिकार खो देता है, और जनता को उसे हटाने का अधिकार है, भले ही इसके लिए बल का प्रयोग करना पड़े। वह इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि अत्याचारी को मारना पाप नहीं है, बल्कि न्याय का एक कार्य हो सकता है।
अनुभाग 3: शास्त्र और इतिहास से प्रमाण
मिल्टन अपने तर्कों को बाइबिल के उदाहरणों और शास्त्रीय इतिहास से समर्थन देते हैं। वह ओल्ड टेस्टामेंट के उन प्रसंगों का हवाला देते हैं जहाँ न्यायाधीशों और राजाओं को उनकी दुष्टता के लिए दंडित किया गया था या उन्हें पद से हटा दिया गया था। वह ग्रीक और रोमन इतिहासकारों और दार्शनिकों के लेखन का भी उल्लेख करते हैं, जो यह मानते थे कि अत्याचारियों का विरोध करना और उन्हें मारना नागरिकों का एक वैध कार्य था। मिल्टन इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि प्राचीन समाजों में भी, शासकों को जनता के प्रति जवाबदेह ठहराया जाता था, और उनके अधिकारों को निरंकुश नहीं माना जाता था। यह खंड यह स्थापित करने का प्रयास करता है कि उनका तर्क कोई नया या क्रांतिकारी विचार नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक मिसालों और नैतिक परंपराओं में निहित है।
अनुभाग 4: राजाओं और मजिस्ट्रेटों के पद की प्रकृति
यह अनुभाग मिल्टन के शासन के संविदात्मक सिद्धांत (contractual theory of government) को और विकसित करता है। वह स्पष्ट करते हैं कि राजाओं का "राज" करना एक जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है, बल्कि जनता द्वारा उन्हें दिया गया एक "कार्यकाल" (tenure) है। यह कार्यकाल तब तक वैध है जब तक राजा जनता के हितों में शासन करता है और कानूनों का पालन करता है। यदि राजा कानूनों का उल्लंघन करता है, तो वह एक निजी व्यक्ति बन जाता है जो अपने अधिकार का दुरुपयोग कर रहा है, और उसे किसी अन्य अपराधी की तरह ही दंडित किया जा सकता है। मिल्टन यह भी तर्क देते हैं कि जनता को अपने प्रतिनिधियों (जैसे संसद) के माध्यम से या सीधे तौर पर, अत्याचारी राजाओं को दंडित करने का अधिकार है। वह उन लोगों के पाखंड को उजागर करते हैं जो राजा के खिलाफ विद्रोह करने की निंदा करते हैं लेकिन फिर भी अत्याचारी शासन के अधीन रहना पसंद करते हैं।
अनुभाग 5: विवेक और कानून का आह्वान
अंतिम अनुभाग में, मिल्टन अपने पाठकों से विवेक और न्याय की भावना से कार्य करने का आग्रह करते हैं। वह जोर देते हैं कि राजशाही को समाप्त करना और राजा को फाँसी देना कोई आकस्मिक या आवेशपूर्ण कार्य नहीं था, बल्कि न्याय और प्राकृतिक कानून के सिद्धांतों पर आधारित एक सुविचारित निर्णय था। वह उन लोगों को धिक्कारते हैं जो राजा के प्रति निष्ठा का झूठा दावा करते हुए जनता के अधिकारों को कमजोर करते हैं। मिल्टन का मानना है कि ईश्वर न्याय और स्वतंत्रता का समर्थन करता है, और जो लोग अत्याचारी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए कार्य करते हैं, वे ईश्वर की इच्छा के अनुसार ही कार्य कर रहे हैं। वह पाठकों से अपील करते हैं कि वे डर या परंपरा से बंधे न रहें, बल्कि अपने अधिकारों और दायित्वों को पहचानें और उन पर कार्य करें।
साहित्यिक शैली: राजनीतिक निबंध, राजनीतिक पुस्तिका (Political Treatise, Political Pamphlet)
लेखक के बारे में कुछ तथ्य:
- जॉन मिल्टन (John Milton) (1608-1674) एक अंग्रेजी कवि, लेखक और सिविल सेवक थे। वह अपनी महाकाव्य कविता 'पैराडाइज लॉस्ट' (Paradise Lost) के लिए सबसे प्रसिद्ध हैं।
- वह एक कट्टरपंथी प्यूरिटन थे और अंग्रेजी गृहयुद्ध के दौरान संसद के पक्ष में थे।
- उन्होंने ओलिवर क्रॉमवेल की सरकार के तहत एक सिविल सेवक के रूप में कार्य किया, मुख्य रूप से विदेशी भाषाओं के सचिव के रूप में।
- उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के लिए कई राजनीतिक और धार्मिक पुस्तिकाएं लिखीं।
- वह लैटिन, ग्रीक और हिब्रू सहित कई भाषाओं में पारंगत थे।
- उनकी मृत्यु के समय तक, वह पूरी तरह से अंधे हो चुके थे।
नैतिकता/सीख:
इस पुस्तक की केंद्रीय नैतिकता यह है कि शासकों की शक्ति जनता से आती है और वे जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। यदि कोई शासक अत्याचारी बन जाता है और कानूनों या जनता के अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो जनता को उसे पद से हटाने और दंडित करने का अधिकार है। यह दैवीय अधिकार के सिद्धांत को चुनौती देता है और लोकप्रिय संप्रभुता (popular sovereignty) के विचार को बढ़ावा देता है।
जिज्ञासाएँ:
- यह पुस्तक 1649 में, इंग्लैंड के राजा चार्ल्स प्रथम को फाँसी दिए जाने के कुछ हफ्तों बाद प्रकाशित हुई थी। इसका उद्देश्य राजा को फाँसी देने के कार्य को नैतिक और कानूनी रूप से न्यायोचित ठहराना था।
- इस पुस्तक के कारण मिल्टन को उस समय के राजनीतिक विवादों में एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में स्थापित किया गया।
- 'द टेन्योर ऑफ़ किंग्स एंड मजिस्ट्रेट्स' ने मिल्टन को अंग्रेजी राष्ट्रमंडल के प्रमुख प्रचारकों में से एक बना दिया।
- राजशाही की बहाली के बाद (1660 में चार्ल्स द्वितीय के सत्ता में आने पर), मिल्टन को उनके राजनीतिक लेखन के कारण गिरफ्तारी का खतरा था और उन्हें कुछ समय के लिए छिपाना पड़ा। इस पुस्तक को सार्वजनिक रूप से जलाया भी गया था।
- इस काम को आधुनिक राजनीतिक विचारों, विशेष रूप से सरकार के संविदात्मक सिद्धांत और नागरिक अवज्ञा के अधिकार के अग्रदूतों में से एक माना जाता है।
